
क्षणिकाएं
(1)
सहमी सी
डरी सी
हारी सी
निकली थी घर से
नुक्कड़ पर
कई विकल्प खड़े थे,
सच्चाई और साहस
चुन लिए और
जीत गई
*
(२)
हम
ग़म के घरोंदे बन
एकाकी बैठे थे
तुमने छुआ
खुशियों की तितलियाँ
बिखर गई |
*
(३)
अपनों से
बिछडने की रेखा
ह्रदय पर गहरी पड़ी है
पर नवजात के
अधरों की थिरकन
हर बार,
दीवारों पर टंगी
तस्वीरों पर
भारी पड़ी है
*
(४)
श्वेत - श्याम
सपने थे मेरे
फिर एक निशा
तुम आये - मेरे सपने में
और सभी रंगीन हो गए
*
(५)
उल्लासित बेटी
स्वेच्छा प्रणय पर,
-पर माँ की पलकों पर
नमी आ गई.
पूछा जो किसी ने ... क्यूँ ?
तो सिसकी ले बोली
मुझे अपनी माँ
याद आ गई .
*
(६)
फिर
एक बार
शाकाहारी होने की
कसमें खाई
और भेड़ों के
निर्णायक वोटों से
भेड़िये जीत गए
*
विनय के जोशी