शुक्रवार, 4 जून 2010

यादें / फना होते बादल


यादें / फना होते बादल
*
मैं दिन में
सपने देखता था,
क्यूँ कि ,
जलाना होता था उन्हें,
रातों को रोशन करने के लिए |
गर रातें रोशन न होती तो,
कैसे पढ़ पाती मेरी उंगलियाँ वे इबारतें ,
जो तुम्हारी आँखों ने,
मेरी पीठ पर लिखी थी |
कैसे देखा पाता वह सोंधी महक,
जो तुम आँगन के नीम पर
टांग कर चली गई थी |
इतना ही नही,
रात भर जो डाकियाँ,
दौड़ता रहता था धड़कनों की चिट्ठियां बांटने,
उसे भी तो हांशियें पर उग आये
काँटों से बचाना होता था |
सिसकियाँ रेंगती थी हलक से पलक तक ,
उन्हें टूटे अधरों की
किरचों से बचाना था |
काल के कारखाने के,
सभी कल पुर्जे ठीक ही काम कर रहे थे
लेकिन ,
उम्र के हिमनद क्या करे जो
चुपचाप पसरता चला गया और,
मन की सरकार ने
यादों की खेती
अवैध घोषित कर दी
बस ! मैंने भी
बंद कर दिया ,
दिन में सपने देखना
अब मैं,
रातों को सपने देखता हूँ
और दिन में गमछे सा
कंधे पर टांक देता हूँ,
पसीना पोंछने के लिए |
*
विनय के जोशी


भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

Internationalized Domain Names

Internationalized Domain Names