
पलकों पर ठहरी है
रात की खुशबू
अनकही अधूरी हर
बात की खुशबू
साँसों की थिरकन पर
चूड़ी का तरन्नुम
माटी के जिस्म में
बरसात की खुशबू
पतझड़ पलट गया
दहलीज तक आकर
जीत गई अंकुरित
ज़ज्बात की खुशबू
अहसास ऐ मुहब्बत
परत परत मर गया
जिंदा रही पहली
मुलाकात की खुशबू
पलकें झुका के कैफियत
कबूल की मगर
ज़वाबों से आती रही
सवालात की खुशबू
जुल्फों की कैद में
कुछ अरसा ही रहे
उम्र भर आती रही
हवालात की खुशबू
कली रो पड़ी हूर के
गजरे में संवर कर
भूल ना पाई पडौसी
पात की खुशबू
लापता वियाकरण
अश'आर से मगर
हर लफ्ज से है
"विशेष" बात की खुशबू

