बुधवार, 25 मार्च 2009

पलकों पर ठहरी है रात की खुशबू


पलकों पर ठहरी है
रात की खुशबू
अनकही अधूरी हर
बात की खुशबू

साँसों की थिरकन पर
चूड़ी का तरन्नुम
माटी के जिस्म में
बरसात की खुशबू

पतझड़ पलट गया
दहलीज तक आकर
जीत गई अंकुरित
ज़ज्बात की खुशबू

अहसास ऐ मुहब्बत
परत परत मर गया
जिंदा रही पहली
मुलाकात की खुशबू

पलकें झुका के कैफियत
कबूल की मगर
ज़वाबों से आती रही
सवालात की खुशबू

जुल्फों की कैद में
कुछ अरसा ही रहे
उम्र भर आती रही
हवालात की खुशबू

कली रो पड़ी हूर के
गजरे में संवर कर
भूल ना पाई पडौसी
पात की खुशबू

लापता वियाकरण
अश'आर से मगर
हर लफ्ज से है
"विशेष" बात की खुशबू

गुरुवार, 12 मार्च 2009

गुरुवे नमः


कहाँ से आते चन्दा मामा
कैसे उगते रात सितारे
फल पेडों पर कैसे लगते
पेड़ खड़े है बिना सहारे
पश्चिम सारा लाल हो गया
काली अंधियारी रात फैली
छोटा सा मन बुझ ना पाता
सब कुछ लगता एक पहेली
विद्यालय में आते जैसे
जादू सारा समझ में आता
सहज सरल उदाहरण देकर
शिक्षक सारे भेद बताता
जो सूरज आकाश ना उगता
क्या हालत नजरों की होती
दृष्टी देते मात-पिता और
गुरु देते आँखों को ज्योति

रविवार, 8 मार्च 2009

विहग विचार


दसियों कबूतर
एक दूसरे को
ठेलते
रेत में
ना जाने क्या
चुगते रहते !
मै उदास,
आंगन में
दाने बिखेर
कबु आओ....कबु आओ
करता घंटों मनुहार
पर नही आते
कपोत आगार

जीवन सहरा में
बचपन किसी
नख़लिस्तान सा
छूट गया
पर नही बदली
नियति
तर्जनी के
प्रथम पोर पर
अंगुष्ठ दबाये
वाम करतल पर ठुड्डी
क्षितिज पर दृग
उर में बैचेनी
कोहनी तले कागज़
प्रतिक्षारत
तृण कातर
आमंत्रण लाचार
कबहु आओ....कबहु आओ
पर नही उतरते
मन आंगन में
विहग विचार


भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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