
मौज का महल ध्वस्त नहीं होता
नूरे मुन्तजिर पस्त नहीं होता
शब् धरती की अपनी करनी है
दिनकर कभी अस्त नहीं होता
ज़ुल्म कही भी हो व्यथित होता है
सुखनवर कभी व्यस्त नहीं होता
झुकता रहा सज़दे में हरबार मगर
कही सर तो कही दस्त नहीं होता
फकीरी नहीं होती हमसफ़र जिसकी
शाह होता है मगर मस्त नहीं होता
बेतरतीब अश'आर पेश है, हर कोई
वियाकरण का अभ्यस्त नहीं होता
