मंगलवार, 26 जनवरी 2010

दिनकर कभी अस्त नहीं होता


मौज का महल ध्वस्त नहीं होता
नूरे मुन्तजिर पस्त नहीं होता

शब् धरती की अपनी करनी है
दिनकर कभी अस्त नहीं होता

ज़ुल्म कही भी हो व्यथित होता है
सुखनवर कभी व्यस्त नहीं होता

झुकता रहा सज़दे में हरबार मगर
कही सर तो कही दस्त नहीं होता

फकीरी नहीं होती हमसफ़र जिसकी
शाह होता है मगर मस्त नहीं होता

बेतरतीब अश'आर पेश है, हर कोई
वियाकरण का अभ्यस्त नहीं होता

1 टिप्पणी:

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

फकीरी नहीं होती हमसफ़र जिसकी
शाह होता है मगर मस्त नहीं होता
...वाह! यह शेर आज दुबारा पढ़ रहा हूँ..हिंद युग्म
में इससे पहले पढ़ा था..उतना ही आनंद आया पढ़कर.



भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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