बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

तड़ित


आज की जिंदगी
इस कदर टुकड़ों में बंट गई है
कि इंसान की मौत मैं भी,
पूर्णता नहीं रह गई है.
हजारो में से कोई एक
सम्पूर्ण मौत मरता होगा
और मरने के बाद खुद भी,
अपनी मौत पर गर्व करता होगा .
अरे ! आज कल एक साथ
पूरी मौत होती ही कंहा है ?
टुकडे टुकडे मौत की
किरचे समेटती
लहुलुहान रूह को
पता ही नहीं चलता
कब मासूमियत की मौत हुई
कब अच्छाई, इमानदारी
पवित्रता और खुद्दारी कल बसी,
कब चल बसा,
बचपन का भोलापन,
यौवन का उत्साह
झूठ बोलते है सब,
हर एक को पता है ,
कंहा और कब कितनी मोते हुई,
कब चाँदी के टुकड़ो खातिर मरा
कब जिंदगी बिगाड़ी, ज़िन्दगी बनाने खातिर
मानव गोस्त और सत्ता वेश्या के लिए तो
कदम कदम पर ख़ुदकुशी होती रही,
दोष किसका ?
बचपन में, सो जा - नहीं तो शेर आ जाएगा से,
खंडित विश्वास को
कई हमसफ़र मिलते चले गए और
इस देह मंदिर से मूल्य रिसते चले गए.
जब आस्था और विश्वास ही
मुर्दा हो तो,
इंसान ज़िंदा नहीं होता,
जिस्मों में आत्म उद्वेलित
तड़ित न हो तो,
स्पंदन पैदा नहीं होता
लाशो के समागम से
जीवन पैदा नहीं होता
*
विनय के जोशी

बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

1411


दो पगी
दोगला जीव
दाही दुश्मन
जंगल का.
स्वार्थी - स्वच्छंदी
स्वघाती अपने
मंगल का.
जमीं पर जमा दिए,
भू से भुवन तक,
कंक्रीटी-गजराज भसूँडे.
धरा धमकाती
वनराज समंदर में
आंशियाँ ढूंढे.


भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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