नमो चक्रधर
*
हिमालय से
सरके
हिमप्रस्तर
मौन मानुष
हिमनद
पिघल कर
सतत प्रवाही
माँ हो गए
तह अंगीकार विकार
सतह अमृत सिंचन
जलधि हिय समा
हवा की पालकी संग
कण कण तुषार
फिर हिमालय हो गए
सर्वत्र
यही परिलक्षित
अणु से आकाशगंगा
अनंत
अनिवारित चक्राधीन
*
विनय के जोशी
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