रविवार, 19 सितंबर 2010

माँ


जब धूप पसर जाती
रसोईघर के बाहर
मैं वहां बैठ
अ से अम्मा
लिखा करता
माँ धुएँ के कोहरे में
गुनगुनाती
आटा गूंथती
रोटियां बेलती
और साथ ही बनाती
आटे की छोटी-छोटी गोलियां
फिर उन्हें
आँगन में फैला देती
एक-दो-तीन
कई चिडियां आती
चहचहाती
गोलियां चुगती
सजीव हो जाते
बेलन, कलछी, चिमटा
अग्नि नृत्य करती
चूल्हे की मुंडेर पर
रसोईघर जलसाघर हो जाता
.
अब न घर में माँ हैं
न शहर में चिडियां
बस केवल
आटे की गोलियां बची है
जब कभी तन्हा होता हूँ
कुछ गोलियां बिखेर देता हूँ
और माँ
चिडियां बन
मन के आँगन में
उतर आती है

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

लफ़्जों के तस्कर आबाद यहां

सीता अब लकीर नहीं रखती
द्रोपदी भी चीर नहीं रखती
.
रंभा, मेनका, उर्वशी तो है
जन्नते हुस्न हीर नहीं रखती
.
दौलत ऐ खुदगर्जी हो तो दस्तक दें
राजनीति फ़कीर नहीं रखती
.
लफ़्जों के तस्कर आबाद यहां
यह गली अब मीर नहीं रखती
.
जेरो-जबर ना काफ़िया पेमा
विशेष कलम जंजीर नहीं रखती
.


भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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