सीता अब लकीर नहीं रखती
द्रोपदी भी चीर नहीं रखती
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रंभा, मेनका, उर्वशी तो है
जन्नते हुस्न हीर नहीं रखती
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दौलत ऐ खुदगर्जी हो तो दस्तक दें
राजनीति फ़कीर नहीं रखती
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लफ़्जों के तस्कर आबाद यहां
यह गली अब मीर नहीं रखती
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जेरो-जबर ना काफ़िया पेमा
विशेष कलम जंजीर नहीं रखती
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