माँ कभी बीमार नही होती
क्या पता
सोती भी है या नही ,
जब मैं सोता ,
वह जगी होती ,
जब मैं जगता , वह
झाडू - पानी -सफाई कर ,
फूंकनी ले ,
चुल्हे के पडौस में
बैठी होती ,
कभी घट्टी पर ,
कभी गौशाला में ,
माटी में गोबर गूंथ,
दीवारों पर
खजूर बनाती,
गुदडियों को सुई चुभोती ,
ढिबरी में तेल भर
उजाला करती ,
दिन भर
कुछ ना कुछ करती ही रहती ,
मुझे बुखार आता ,
दद्दू खटियां पर पडे रहते ,
बाबा खांसते- खांसते दुहरा जाते....
पर , पर माँ कभी बीमार नही होती
फिर भी.........
फिर भी ना जाने
जल्दी .....
मर क्यूं जाती है ?
विनय के जोषी
3 टिप्पणियां:
BAHUT HI BADHIYA
....
RAJNEESH
अच्छी प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
Maa ko bimar to sara ghar bimar....
sabki chinta jo rahti hai..
...Maa ko saakar kar diya aapne..aabhar!
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