पहले हथेली में मेरे गुलाब रोप दिया,
फिर गले मिलते ही छुरा घोप दिया।
छुआ भर था, मेहंदी को एक शाम,
उम्र भर के लिए सिंदूर थोप दिया।
अर्पण कर दिए जब दोनों पंख तुम्हे,
बदले में तुमने आसमान सौंप दिया।
चाही जो रियायत सांसों के मूल्य में,
मुस्करा के एक नया करारोप दिया ।
माँगा जो इलाज दिल की लगी का,
दर्दे दिल का एक नया प्रकोप दिया।
कट गया जब नीम आँगन का।
धूम से पौधा तुलसी का रोप दिया।
विनय के.जोशी
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