मोर पपिहा खेजडी, करता रहा तलाश ।
धीरे धीरे मिट गया, बादल एक आकाश।।
.
टपटप टपके टापरा, पिया गये परडेर ।
बरखा से काली पडी, नजर कूप मुण्डेर।।
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पूरनमासी शरद की, अमी पयस बरसात ।
अंक यामिनी गुलमुहर, झुलसा सारी रात।।
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असली सूरत लापता, मुह खोटे अनगीन।
जैसा ओसर सामने, मुखडे पर धर लीन।।
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हेम रजत झंकार नित, गूंजे जाके कान।
गाली सी वाको लगे, आरती अरु अजान।।
.
अंधियारा मावस भरा, रोशन बिन्दु प्रहार।
अभिकर्ता जुगनू हुए , चंदा करे व्यापार।
,
विनय के जोशी
शनिवार, 25 अक्टूबर 2008
रविवार, 12 अक्टूबर 2008
क्षणिकाएं
(१)
जल
छू सकता
महसूस कर सकता
छाया को
लेकिन, अपने साथ
बहा नही सकता
(२)
छाया
लिपट सकती
चूम सकती
जल से
लेकिन, उसमें
नहा नही सकती
(३)
पेड़
अचल तन मन
मनस्वी
नदी छाया के
खेल से अविचलित
तपस्वी
(४)
नदी
पहाड़ से बिछडती
विलाप करती
कितनी शांत जब
सागर से
मिलाप करती
(५)
पहाड़
उर की आग
मन का गुबार
घुटन का उभार
(६)
बादल
रुई के
उड़ते फोहे नम
पहाड़ के
जख्मों पर
लगाते मरहम
(७)
फूल
अम्बर को
स्वीकार
माटी का
आभार
.
विनय के जोशी
जल
छू सकता
महसूस कर सकता
छाया को
लेकिन, अपने साथ
बहा नही सकता
(२)
छाया
लिपट सकती
चूम सकती
जल से
लेकिन, उसमें
नहा नही सकती
(३)
पेड़
अचल तन मन
मनस्वी
नदी छाया के
खेल से अविचलित
तपस्वी
(४)
नदी
पहाड़ से बिछडती
विलाप करती
कितनी शांत जब
सागर से
मिलाप करती
(५)
पहाड़
उर की आग
मन का गुबार
घुटन का उभार
(६)
बादल
रुई के
उड़ते फोहे नम
पहाड़ के
जख्मों पर
लगाते मरहम
(७)
फूल
अम्बर को
स्वीकार
माटी का
आभार
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विनय के जोशी
मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008
रंग
लाल हरे
नीले पीले
एक दूजे से मिल
फिर-फिर,
नये-नये
रंग बनाते रंग,
रंग बिरंगे रंग
बिखेर दिए तुमने
हर टहनी पर
हवा संग लहराती टहनियाँ ,
आसमान में रंग भरती टहनियाँ
गगन में अगन और
बदन में बरखा के अभी
कुछ ही रंग भरे थे कि
तुम चल दिए लाम पर
कलेवा और कसमें
दी थी राह के लिए,
तुम तो रंग भी समेट ले गए
लेकर गए हजारों,
लौटे केवल तीन लेकर
नयन नीर का तर्पण देकर
इन्द्रचाप से मुख मोड़ लिया
तस्वीर तुम्हारी सजा केसरिया
दर्पण से नाता तोड़ लिया
बीज सहेजा था जो उर में
हरा उससे जोड़ लिया
सौगात तुम्हारी सर माथे
रंग सफेद ख़ुद ओढ़ लिया
.
विनय के जोशी
नीले पीले
एक दूजे से मिल
फिर-फिर,
नये-नये
रंग बनाते रंग,
रंग बिरंगे रंग
बिखेर दिए तुमने
हर टहनी पर
हवा संग लहराती टहनियाँ ,
आसमान में रंग भरती टहनियाँ
गगन में अगन और
बदन में बरखा के अभी
कुछ ही रंग भरे थे कि
तुम चल दिए लाम पर
कलेवा और कसमें
दी थी राह के लिए,
तुम तो रंग भी समेट ले गए
लेकर गए हजारों,
लौटे केवल तीन लेकर
नयन नीर का तर्पण देकर
इन्द्रचाप से मुख मोड़ लिया
तस्वीर तुम्हारी सजा केसरिया
दर्पण से नाता तोड़ लिया
बीज सहेजा था जो उर में
हरा उससे जोड़ लिया
सौगात तुम्हारी सर माथे
रंग सफेद ख़ुद ओढ़ लिया
.
विनय के जोशी
सोमवार, 6 अक्टूबर 2008
घुटन
थम जाते है
कदम मेरे लिए
चेतना का हर पल
मुझे समर्पित है
हर आह
हर सिसकी पर
रहता है मेरा नाम
लेकिन हर एक को
अपने से अलग
करने की कोशिश में पाता हूँ
मै
जिस्म में चुभा कांटा हूँ
चीखो
चिल्लाओ
कोहराम मचा दो
पर मुझे तो ना कोसो
अरे !
तुम्हे तो फकत
मेरी चुभन का ही दर्द है
मेरा तो
दम घुटा जा रहा है
तुम्हारे जिस्म में
.
विनय क जोशी
कदम मेरे लिए
चेतना का हर पल
मुझे समर्पित है
हर आह
हर सिसकी पर
रहता है मेरा नाम
लेकिन हर एक को
अपने से अलग
करने की कोशिश में पाता हूँ
मै
जिस्म में चुभा कांटा हूँ
चीखो
चिल्लाओ
कोहराम मचा दो
पर मुझे तो ना कोसो
अरे !
तुम्हे तो फकत
मेरी चुभन का ही दर्द है
मेरा तो
दम घुटा जा रहा है
तुम्हारे जिस्म में
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विनय क जोशी
रविवार, 5 अक्टूबर 2008
बुधवार, 1 अक्टूबर 2008
शहर के पेड़
अट्टालिकाओं
निर्मित कुआँ
खासंते वाहन
उगलते धुआं
सुलगती चिमनियाँ
जहरीले आगार
जबरन तन नौचते
विद्युत भुजंग तार
ज्ञापन विज्ञापन
छाती में कीले
दिल खुरचे
नाम छीले
छिकती खिड़कियाँ
बेसुध वातायन
उतावले राहगीर
घृणित सिंचन
फ़िर भी
जिन्दा है
सब कुछ सहते
सभ्यों की
असभ्यता
उर में धरते
क्यूँ कि,
पेड़ आत्महत्या
नही करते
.
विनय के जोशी
निर्मित कुआँ
खासंते वाहन
उगलते धुआं
सुलगती चिमनियाँ
जहरीले आगार
जबरन तन नौचते
विद्युत भुजंग तार
ज्ञापन विज्ञापन
छाती में कीले
दिल खुरचे
नाम छीले
छिकती खिड़कियाँ
बेसुध वातायन
उतावले राहगीर
घृणित सिंचन
फ़िर भी
जिन्दा है
सब कुछ सहते
सभ्यों की
असभ्यता
उर में धरते
क्यूँ कि,
पेड़ आत्महत्या
नही करते
.
विनय के जोशी
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