शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

कुछ दोहे

मोर पपिहा खेजडी, करता रहा तलाश ।
धीरे धीरे मिट गया, बादल एक आकाश।।
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टपटप टपके टापरा, पिया गये परडेर ।
बरखा से काली पडी, नजर कूप मुण्डेर।।
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पूरनमासी शरद की, अमी पयस बरसात ।
अंक यामिनी गुलमुहर, झुलसा सारी रात।।
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असली सूरत लापता, मुह खोटे अनगीन।
जैसा ओसर सामने, मुखडे पर धर लीन।।
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हेम रजत झंकार नित, गूंजे जाके कान।
गाली सी वाको लगे, आरती अरु अजान।।
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अंधियारा मावस भरा, रोशन बिन्दु प्रहार।
अभिकर्ता जुगनू हुए , चंदा करे व्यापार।
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विनय के जोशी

4 टिप्‍पणियां:

Vinay ने कहा…

दीपावली के पावन पर्व पर आपको हार्दिक बधाई!

Asha Joglekar ने कहा…

बहुत सुंदर कविताएँ हैं आपकी । और क्षणिकाएँ तो बेहद पसंद आईं ।
आपको भी दीपावली का पर्न और नया वर्ष शुभ सुंदर और उन्नती दायक हो .

seema gupta ने कहा…

पूरनमासी शरद की, अमी पयस बरसात ।
अंक यामिनी गुलमुहर, झुलसा सारी रात।।
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"great composition very touching"

Regards

daanish ने कहा…

shabdoN ki sadbhaavna, bhaavoN ka vistaar , mn.bhaavan dohaavalee,
uttam nek vichaar.
sabhi dohe prabhaavshaali haiN.
badhaaee . . .
---MUFLIS---



भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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