बुधवार, 12 नवंबर 2008

पुनर्जन्म

दो झोले लेकर चला था
मैं सफर को
एक में पाप बटोरने थे
एक में पुण्य
राह में एक तरफ पाप
दूसरी तरफ पुण्य
बिखरे पड़े थे
पाप की राह में छांव थी
शीतल जल ..... लुभावना संगीत
खुशबुएँ ........... रसीले स्वाद
सुर......सुरा....सुंदरियाँ ...
क्या नही था
सब कुछ लुभावना
अपना सा था
पराया कुछ भी नही था
दूसरी तरफ कुछ नही था सहज
धूप में तपते पत्थर
नि:शब्द रुदन ...
रहस्यमयी सिसकियाँ .....
हर तरफ़ मदद को पुकारते हाथ उग रहे थे
हर तर्जनी की पौर पर ठहरा था एक आंसू
जो फकत मेरी रूह की छुअन चाहता था
मगर छूना तो दूर
मैं उस तरफ़ देख भी ना सका
किसी एक आंख वाले ऊंट की तरह
एक तरफ चरता चला गया
और पापों से अपनी झोली भरता चला गया
धीरे धीरे बोझ से मेरा जिस्म
एक ओर झुकता चला गया
और फ़िर एक दिन
अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ
पाप के लहराते समंदर में जा गिरा
तभी
कुछ हाथ आगे बढे
मेरे डूबते सर पर
सफेद टोपी पहना दी
.........और................
मेरे सभी पाप
पुण्य में बदल गए
,
विनय के जोशी

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भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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