रविवार, 12 अक्टूबर 2008

क्षणिकाएं

(१)
जल
छू सकता
महसूस कर सकता
छाया को
लेकिन, अपने साथ
बहा नही सकता
(२)
छाया
लिपट सकती
चूम सकती
जल से
लेकिन, उसमें
नहा नही सकती
(३)
पेड़
अचल तन मन
मनस्वी
नदी छाया के
खेल से अविचलित
तपस्वी
(४)
नदी
पहाड़ से बिछडती
विलाप करती
कितनी शांत जब
सागर से
मिलाप करती
(५)
पहाड़
उर की आग
मन का गुबार
घुटन का उभार
(६)
बादल
रुई के
उड़ते फोहे नम
पहाड़ के
जख्मों पर
लगाते मरहम
(७)
फूल
अम्बर को
स्वीकार
माटी का
आभार
.
विनय के जोशी

1 टिप्पणी:

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

bahut badhiyaa likhi hai-

नदी
पहाड़ से बिछडती
विलाप करती
कितनी शांत जब
सागर से
मिलाप करती



भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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