शुक्रवार, 1 मई 2009

उपेक्षा


उपेक्षा
जागी उकताई रात ने
पैदा किया एक और
आवारा सूरज

भौर से शाम तक
झुलसता भटकता रहा
कोण बदल बदल कर
देखता रहा
धरा को शायद
छांव मिल जाय
प्यार मिल जाय
पनाह मिल जाय
छांव प्यार पनाह तो दूर
किसी ने एक दृष्टि
ना दी आभार में..........

हर कोई
उपभोग करता रहा
रोशनी का
पर किसी ना देखा
सूरज की और

उपेक्षा की आग
सीने में लिये
जलता रहा दिन भर
थोथे स्वार्थी सम्बन्धो पर
जब घीन्न आने लगी

डूब मरा
समन्दर में जाकर कही........
और रात .......
पुन: गर्भवती हो गईे

*

vinay k joshi

3 टिप्‍पणियां:

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

विनय जी,

आपकी कविताओं को हिन्द-युग्म पर मैनें पढा है, आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ। बहुत ही अच्छी और भाव प्रधान कविता लिखते हैं आप।

प्रस्तुत कविता में आखिरी बंद शायद, मेरी नज़रों में कविता की जान है।

आनंद आ गया, बधाईयाँ।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

विजय तिवारी " किसलय " ने कहा…

अभिव्यक्ति में दम है परंतु सटीक उद्देश्य और पूर्णता की अपेक्षाहै.
- विजय तिवारी "किसलय "

neelam ने कहा…

bahut khoob vinay ji



भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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