उपेक्षा
जागी उकताई रात ने
पैदा किया एक और
आवारा सूरज
भौर से शाम तक
झुलसता भटकता रहा
कोण बदल बदल कर
देखता रहा
धरा को शायद
छांव मिल जाय
प्यार मिल जाय
पनाह मिल जाय
छांव प्यार पनाह तो दूर
किसी ने एक दृष्टि
ना दी आभार में..........
हर कोई
उपभोग करता रहा
रोशनी का
पर किसी ना देखा
सूरज की और
उपेक्षा की आग
सीने में लिये
जलता रहा दिन भर
थोथे स्वार्थी सम्बन्धो पर
जब घीन्न आने लगी
डूब मरा
समन्दर में जाकर कही........
और रात .......
पुन: गर्भवती हो गईे
*
vinay k joshi
3 टिप्पणियां:
विनय जी,
आपकी कविताओं को हिन्द-युग्म पर मैनें पढा है, आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ। बहुत ही अच्छी और भाव प्रधान कविता लिखते हैं आप।
प्रस्तुत कविता में आखिरी बंद शायद, मेरी नज़रों में कविता की जान है।
आनंद आ गया, बधाईयाँ।
सादर,
मुकेश कुमार तिवारी
अभिव्यक्ति में दम है परंतु सटीक उद्देश्य और पूर्णता की अपेक्षाहै.
- विजय तिवारी "किसलय "
bahut khoob vinay ji
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