.jpg)
प्यार तुम्हारा
दौलत सारे जंहा की
मुट्ठी में ,
अब वही
रेत सा,
उँगलियों के
झरोखों से
रिसा जाता है
लगाव तुम्हारा,
नाचता पारद
करतल पर,
अब वही
कपूर बन
हवा में
घुला जाता है.
वो एक अहसास
कि तुम गैर नहीं
और मैं तुम्हारे
बगैर नहीं,
उम्र की आग में
राख हुआ जाता है.
प्यार - मनुहार
अर्पण-समर्पण
गैर-बगैर
सभी सतही बातें है
वो तो कुछ और ही है
जो बांधे है तुमसे
अबूझ
अनकहा
अपरिभाषित
परे है जो,
वेदना-सवेदना
प्रेषण-संप्रेषण
प्रणय-परिणय
प्राप्य-अप्राप्य परिधि से
सांस हो तुम,
जो शारीर को
शव से भिन्न करती है
पल पल साथ
फिर भी विस्मृत,
लेकिन जब घुटन होती है तो,
तो...... तुम्हे
खीच कर फेफडे में
भरने को मन करता है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें