गुरुवार, 11 जून 2009

तुम बिन
सपाट सूनापन
याद कण कण
में पसर जाना,
सजा कर
लपटे जुल्फों की ,
इठलाना बलखाना
संवर जाना ,
बेतरतीब कर के
रूह की सिलवटें मेरी,
दुपट्टे का सर से
उतर जाना,
चमक ले चांद से,
अपने चहरे पर,
तुम और भी
संवर जाना ,
हिचकना कैसा
ये तो है चलन
जमाने का,
चुरा नूर ओरों का ,
खुद और भी
निखर जाना ,
मुझे ना आजमाना
मैं सच का सौदाई हूँ,
अक्स तेरा ही मिटेगा
जो उतरी मेरी कलई
मेरा क्या ,
मैं तो आईना हूँ ,
और
मेरा मुकद्दर है
गिरना,
छनकना,
टूटकर बिखर जाना
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सनद
*
अश्क, आहे, लहू होते वसीयत में,
आईनों का अस्थिसंचय नहीं होता

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भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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