गुरुवार, 11 जून 2009

वह सुबह कभी तो आयेगी

नेह निर्झर
सूख चुका अब
जन अरण्य
उब चुका अब
अब ना मचलता
लहरों के संग
अब ना संवरता
मौसम के संग
नही बहलता
प्रेम गीत से
अविचल हर
हार जीत से
कोकिल कण्ठ
कर्कस क्रन्दन
रिक्त हदय
यांत्रिक स्पन्दन
श्रृध्दा धाम की
शाम उदास
आरती गौण
नगाडे खास
राम तुम्हारे
द्वार लाचार
रावण विराजे
बैखौफ दरबार
वक्र भाल
कदम बेताल
हाल बेहाल
पेट पाताल
उंगली पर तिलक
मुख पर चमक
मत रमत
चयन युघ्द
रण शरण
निरीह रियाया
कभी तो जीत पायेगी
आर ही आर
लडी जा रही लडाई
कभी तो पार जायेगी
सत्ता स्वार्थ का
तिमिर चीर
वह सुबह
कभी तो आयेगी

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भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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