गुरुवार, 11 जून 2009

फागुन में तुझ पिया
शिथिल है सब अंग
गहने तन पर यूँ पडे
चंदन लिपटे भुजंग
*
सहरा सागर एक से
अवसाद और उमंग
मरे सिपाही के लिये
क्या शांति क्या जंग
*
होली रंगोली स्याह हई
इद्रधनुष अपंग
तुझ बिन मन साधू भया
भगवा हुए सब रंग
*
एक अकेले जीव को
नोंचे कई प्रसंग
रसना विजया जब धरी
गगन मन हुआ पतंग
*
होली दीवाली एक सी
सुदामा के संग
धुल धुसरित मुख घूमते
बच्चे नंगधडंग
*
मन फागुन में मस्त है
साठा तन है दंग
गिरि गुफा में नाचता
साधु कोई मलंग
*
तन तांडव करता रहा
ले डमरु ले चंग
नाचा मन का मौर जब
बजने लगा मृदंग
*
सपने टूटे सांझ पडे
मोह हुए सब भंग
कुछ रंग तरसे अंग को
कुछ अंग तरसे रंग

वह सुबह कभी तो आयेगी

नेह निर्झर
सूख चुका अब
जन अरण्य
उब चुका अब
अब ना मचलता
लहरों के संग
अब ना संवरता
मौसम के संग
नही बहलता
प्रेम गीत से
अविचल हर
हार जीत से
कोकिल कण्ठ
कर्कस क्रन्दन
रिक्त हदय
यांत्रिक स्पन्दन
श्रृध्दा धाम की
शाम उदास
आरती गौण
नगाडे खास
राम तुम्हारे
द्वार लाचार
रावण विराजे
बैखौफ दरबार
वक्र भाल
कदम बेताल
हाल बेहाल
पेट पाताल
उंगली पर तिलक
मुख पर चमक
मत रमत
चयन युघ्द
रण शरण
निरीह रियाया
कभी तो जीत पायेगी
आर ही आर
लडी जा रही लडाई
कभी तो पार जायेगी
सत्ता स्वार्थ का
तिमिर चीर
वह सुबह
कभी तो आयेगी

भूख

झिलमिलाती प्रकाश झूमरे,
कर्कस संगीत लहरे ,
दर्जनों इत्रों से निर्मित बदबू ,
सभ्य चहरो के मुखौटे ,
मुखौटों पर भी नकली हंसी ,
तस्तरी विश्रामघाट आसीन
उदर-श्मशान-राही व्यंजन ,
रंग बिरंगे वस्त्र ,
उजले-तन काले-मन ,
बिखरे हुए थे उस स्नेहभोज में |
ग्रास झपट पात्र भरते
चरते विचरते
टूट पड़े थे उस गिद्ध भोज में |
उपेक्षित सा मैं
हाथ में प्लेट
खोजी नजरे,
वस्त्र बचाता
नाचता-लचकता
असहाय खडा था उस
नृत्य भोज में |
भक्षी एक दुसरे को देख
गुर्रा नही मुस्करा रहे थे
यही अंतर सभ्यता
मशाल जलाये था
उस खोज भोज में |

तभी ..
एक परिचित मिले :
उखडे उखडे से क्यूँ घूम रहे हो
क्या खो गया जिसे तुम ढूंढ रहे हो
मैंने कहा :
भोज समर के योद्धाओं के मुख पर
तृप्ति का अनुनाद ढूंढ रहा हूँ
और छप्पन भोगो की महफ़िल में
एक अदद स्वाद ढूंढ रहा हूँ
कुछ और कहता उससे पहले
बोल पड़ी एक द्वार भिखारन :
बाबू
क्या कभी
कुछ पल
भूखे रहे हो ?
भूख जो महज
एक शब्द है तुम्हारे लिए
उसे सहे हो ?
जब भूख की आंधी आती है तो,
अच्छा-बुरा
ईमान-धरम
अपना-पराया
सब कुछ उड़ा ले जाती है |
टूट जाते है सब बंधन
कड़ी बस एक
पेट और मुहँ की
शेष रह जाती है |
बच्चो के पेट की ठंडक खातिर
अपना जिस्म जलाना पङता है |
खुद का तन नुचवाने को
गिद्धों को बुलाना पड़ता है |
उस रात की फिर
सहर नहीं होती,
हर रात
कहर होती है |
छोटो की भूख मिटाने को
माँ, जब बड़की को
बेच कर आती है |
तुम्हे क्या मालूम
भूख के मारे
कैसे जीते है |
पेट पर कपडा बांध
राख घोल कर पीते है |
बाबू चाहे जितना खोजो
स्वाद न तुन्हें मिल पायेगा |
ढूढ़ सको तो भूख को ढूंढो
स्वाद खुद चला आयेगा |
तुम बिन
सपाट सूनापन
याद कण कण
में पसर जाना,
सजा कर
लपटे जुल्फों की ,
इठलाना बलखाना
संवर जाना ,
बेतरतीब कर के
रूह की सिलवटें मेरी,
दुपट्टे का सर से
उतर जाना,
चमक ले चांद से,
अपने चहरे पर,
तुम और भी
संवर जाना ,
हिचकना कैसा
ये तो है चलन
जमाने का,
चुरा नूर ओरों का ,
खुद और भी
निखर जाना ,
मुझे ना आजमाना
मैं सच का सौदाई हूँ,
अक्स तेरा ही मिटेगा
जो उतरी मेरी कलई
मेरा क्या ,
मैं तो आईना हूँ ,
और
मेरा मुकद्दर है
गिरना,
छनकना,
टूटकर बिखर जाना
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सनद
*
अश्क, आहे, लहू होते वसीयत में,
आईनों का अस्थिसंचय नहीं होता


भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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