गुरुवार, 4 नवंबर 2010

मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,
जिसे पढ़ते ही नजरे थूक दे
पाठक निम्बोली बन जाये,
रोम रोम जिस्म में घुसता कड़वापन
अब बर्दास्त नहीं होता
अंतस की निर्वासित मिठास लापता है
हर रोज जगती थी
आत्मह्त्या के सपनों के साथ
सुना है सुबह के सपने सच होते है
और अब बंगलादेशी घुसपेठियों की तरह
पसरती कड़वाहट का
जिस्म के मुल्क पर आधिपत्य है
आस्था से व्यवस्था तक
कड़वाहट की एक मोटी परत जम चुकी है
लेकिन अब जगह नहीं बची जिस्म में
निगाहों में समाती है तो
जुबा से निकल पड़ती है
निगाहें और जुबा बंद करनी पड़ती है तो
कागज़ पर छलक जाती है
कड़वाहट की खरपतवार अब
मुख्य फसल हो गयी है
मेरे अन्दर का ढोर इसे चर चर के
बहुत मोटा ताज़ा हो गया है
इतना सब होने पर भी
आशा की एक किरण बाकी है
जैसे बुजुर्ग डायरी में 'राम राम' लिखते है
मेरी भी 'मीठा मीठा' लिखने की इच्छा होती है
*
विनय के जोशी

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भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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