रविवार, 24 अप्रैल 2011

तन्हाई की दर्द से शादी है

छले गये जो उजालों की घात में
अंधेरों से लिपट कर रोयेगें रात में

रोशनी मेहमां थी अंधेरों की रात भर
सुबह सूरज ले के आयी सौ्गात में

भीगें सहरा को धूप मरहम सी लगी
फ़फ़ौले हो गये थे बरसात में

फ़ंसी मछली तो हंसा परिन्दा
भरोसा और आदमी की जात में

नदी समा गई समन्दर में
कनारे उलझे रहे औकात में

तन्हाई की दर्द से शादी है
सितारों तुम भी आना बारात में

विनय

1 टिप्पणी:

Rachana ने कहा…

फ़ंसी मछली तो हंसा परिन्दा
भरोसा और आदमी की जात में
kitni gahri baat kahi aapne sunder abhivyakti
rachana



भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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