राजनीति
तिमिर लक्ष्य पर
बढ़ता रथ
भटकी पथ से
हर शपथ
कैसे ?
कौन ?
बताये राह
विवेक सभी का
लहू से
लथपथ
*
उपालंभ
जिस जाडे में
जिस्म जला
जिंदा रखा
तुम्हारी यादों को
उसी में .......
मधुमास तापते
तुम
मेरा नाम तक
भुला बैठे |
*
हंसी
ठहाके महान
पर कुर्बान
उस मुस्कान पर
जो टिकी है
आंसुओं के बांध पर
*
समय
एक और
दिन उगा
काल के
कबूतर ने
जीवन जंगल से
एक और
दाना चुगा
*
विवशता
छाया
लिपट सकती
चूम सकती
नदी को
लेकिन उसमें
नहा नहीं सकती
नदी
छू सकती
महसूस कर सकती
छाया को
लेकिन अपने साथ
बहा नहीं सकती
*
घुटन
कांटें की
चुभन पर
चिल्लाने वालों
कभी सोचा है
उसका दम
घुट रहा है
तुम्हारे जिस्म में
2 टिप्पणियां:
खूबसूरत रचना...अच्छी प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
खूबसूरत रचना...अच्छी प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
एक टिप्पणी भेजें