शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

मुझ पर विस्मित हो फुहार ?

मुझ पर
विस्मित हो फुहार !
सावन कतरा कतरा
जिस्म में उतरता है,
बादल लम्हा लम्हा
आगोश में तड़पता है ,
तगारी में भर सीमेंट कंक्रीट
ख़्वाबों के पुल बनाती हूँ |
फटी ओढ़नी से झांकती
रक्ताल्प देह लहरा,
झरती टहनियों को चिढाती हूँ |
बरस - झूम कर बरस
पहले पसीना घुलेगा
फिर, परत दर परत
जिस्म से लिपटी माटी
उतरती जायेगी |
एक अतृप्त षोडशी आ बसेगी
तन में |
अदम्य कामना संग उगेगी
अनगिन खरपतवार
मन में |
इसी बीच कहीं
वर्षा के कारण कल
रोजगार न मिलने
का चाबुक पडेगा
गीले मन पर |
कुम्हलाने लगगें
कामनाओं के भ्रूण |
बूंदों के मलखंभ पर
करतब दिखाते
चाहतों के शिशु,
स्थिर हो जायेंगे |

बौछारों रुक जाओ !
अब मन अनमना है
चलो घर चले,
चूल्हे से पानी
उलीचना है |

छोटी कवितायेँ

राजनीति

तिमिर लक्ष्य पर
बढ़ता रथ
भटकी पथ से
हर शपथ
कैसे ?
कौन ?
बताये राह
विवेक सभी का
लहू से
लथपथ
*
उपालंभ

जिस जाडे में
जिस्म जला
जिंदा रखा
तुम्हारी यादों को
उसी में .......
मधुमास तापते
तुम
मेरा नाम तक
भुला बैठे |
*
हंसी

ठहाके महान
पर कुर्बान
उस मुस्कान पर
जो टिकी है
आंसुओं के बांध पर
*
समय

एक और
दिन उगा
काल के
कबूतर ने
जीवन जंगल से
एक और
दाना चुगा
*
विवशता

छाया
लिपट सकती
चूम सकती
नदी को
लेकिन उसमें
नहा नहीं सकती
नदी
छू सकती
महसूस कर सकती
छाया को
लेकिन अपने साथ
बहा नहीं सकती
*
घुटन

कांटें की
चुभन पर
चिल्लाने वालों
कभी सोचा है
उसका दम
घुट रहा है
तुम्हारे जिस्म में

रविवार, 24 अप्रैल 2011

तन्हाई की दर्द से शादी है

छले गये जो उजालों की घात में
अंधेरों से लिपट कर रोयेगें रात में

रोशनी मेहमां थी अंधेरों की रात भर
सुबह सूरज ले के आयी सौ्गात में

भीगें सहरा को धूप मरहम सी लगी
फ़फ़ौले हो गये थे बरसात में

फ़ंसी मछली तो हंसा परिन्दा
भरोसा और आदमी की जात में

नदी समा गई समन्दर में
कनारे उलझे रहे औकात में

तन्हाई की दर्द से शादी है
सितारों तुम भी आना बारात में

विनय


भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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