मंगलवार, 9 सितंबर 2008

एक और दिन उगा

एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
लो फिर शुरु हुआ
झुठ कहने और
सुनने का सिलसिला
मन एकाकी औरा ओढे
जन अरण्य मे
भटकने का सिलसिला
विवेक ह्र्दय सत्य सोया
बस स्वार्थ है जगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा

3 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत अच्छा। ऐसा ही लिखते रहें।

vipinkizindagi ने कहा…

achchi rachna

राज भाटिय़ा ने कहा…

जोशी जी आप ने बहुत ही अच्छा लिखा हे धन्यवाद, इन्तजार रहेगा अगली रचना का



भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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