एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
लो फिर शुरु हुआ
झुठ कहने और
सुनने का सिलसिला
मन एकाकी औरा ओढे
जन अरण्य मे
भटकने का सिलसिला
विवेक ह्र्दय सत्य सोया
बस स्वार्थ है जगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
3 टिप्पणियां:
बहुत अच्छा। ऐसा ही लिखते रहें।
achchi rachna
जोशी जी आप ने बहुत ही अच्छा लिखा हे धन्यवाद, इन्तजार रहेगा अगली रचना का
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