रविवार, 21 सितंबर 2008

यादें

किरणों के
पांखी तो
दिन
माह
बरस को
यादों में बदल
उड़ जाते है,
रह जाते है हम
सुनसान द्वीप में
धधकते ज्वालामुखी की तरह
बूंद बूंद झुलसते सपने
राख राख उछलते लम्हे
जलते
पिघलते
उबलते
तह दर तह
जमा होते अहसास
पर्वत के अश्रु
पत्थर होने से लेकर
सूरज के कदमों तले
रौंदे जाने तक
संज्ञाशून्य बने रहना है
या........
दर्द का ज्वालामुखी
सीने में दफ़न किए
एक दिन ख़ुद ही
दफ़न हो जाना है |
.
विनय के जोशी

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भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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