दर्पण में दिखता
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया
मुझ से
परे "मैं" पा गया
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया
मुझ से
परे "मैं" पा गया
2 टिप्पणियां:
दर्पण में दिखता
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता |
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
bahut mast likha hai.....sunder
दर्पण में दिखता
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
बहुत सुन्दर लिखा है।
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