
फूल संग माथे चढी
पंखुडी गुलाब की।
बिछडी तो कदमों पडी
पंखुडी गुलाब की।
*
जोड लिये फागुन में
ओर नये नाते
गुलाल रंग रंग गई
पंखुडी गुलाब की।
*
चांदनी सी रंगत ओ
सीप सी है पलके
अधरों पर धर दिन्ही
पंखुडी गुलाब की।
*
याद तेरी जा पिघली
पलकों के किनारे
ओंस भीगी बिरहन हुई
पंखुडी गुलाब की।
*
अधर धरी बांसुरिया
मालकौस गाये
जल रही किताबों में
पंखुडी गुलाब की।
*
धनुष देह श्वेत केश
झुर्रियां कपोल पर
समय हाथी रौंद गया
पंखुडी गुलाब की।
*
लकडी डाली हाथ जोडे
यार सभी चल दिये
देह संग भस्म हुई
पंखुडी गुलाब की।
*
विनय के जोशी
प्रेषक : vinay k joshi | समय : 6:37 PM
इन्हें भी पढ़ें19 टिप्पणी:
अवनीश एस तिवारी said...
धनुष देह श्वेत केश
झुर्रियां कपोल पर
समय हाथी रौंद गया
पंखुडी गुलाब की।
यही नहीं समझा |
और सब बहुत बहुत अच्छे लगे |
बधाई |
-- अवनीश तिवारी
February 12, 2009 6:57 PM
vinay k joshi said...
अविनाशजी ,
बुढापे का चित्रण है | कमर झुककर देह को धनुष जैसा बना देती है | बाल सफेद हो जाते है मुख पर झुर्रिया पड़ जाती है क्योकि समय रूपी हाथी गुलाब सी देह को रौंद जाता है | कविता पसंद कर उत्साहवर्धन हेतु आभार |
सादर,
विनय के जोशी
February 12, 2009 8:13 PM
संगीता पुरी said...
बहुत सुंदर....
February 12, 2009 8:31 PM
manu said...
विनय जी,
पहले तो मन को मोहा और आख़िर में उदास कर गई पंखुडी गुलाब की,,,,,,,,,,,
बहुत प्यारे शब्दों में बाँधा है.....इस खूबसूरती के साथ.....
February 12, 2009 9:40 PM
sangeeta said...
विनय जी ,
बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति है. आपने इस रचना में जीवन को अंत तक पहुंचाया लेकिन मुझे कहीं बचपन नही नज़र आया. यदि वो भी शामिल होता तो ये जीवन चक्र पूरा हो जाता. .
सुंदर भाव और शब्दों का चयन है..
बधाई
February 12, 2009 10:53 PM
rachana said...
पतंग ,कन्चे, गोटी,गुडिया
समय की धार ने छीन लिया
सावन संग बह चली
पंखुडी गुलाब की
rachana
February 13, 2009 2:57 AM
rachana said...
आप की कविता के क्या कहने मन आनंदित हो गया
सादर
रचना
February 13, 2009 2:59 AM
Harihar said...
याद तेरी जा पिघली
पलकों के किनारे
ओंस भीगी बिरहन हुई
पंखुडी गुलाब की।
क्या बात है विनय जी! बहुत खूब
February 13, 2009 3:34 AM
Arun Mittal "Adbhut" said...
विनय जी,
ये तो रंग बिरंगी कविता है मन प्रसन्न हो गया ......................
February 13, 2009 7:40 AM
neelam said...
लकडी डाली हाथ जोडे
यार सभी चल दिये
देह संग भस्म हुई
पंखुडी गुलाब की।
लकडी डाली हाथ जोडे
यार सभी चल दिये
देह संग भस्म हुई
पंखुडी गुलाब की।
विनय जी आपकी रचना पुरस्कृत करने योग्य है ,ये मेरा मत है |
February 13, 2009 11:41 AM
आलोक सिंह "साहिल" said...
हर बार कि तरह .......बेहतरीन.
आलोक सिंह "साहिल"
February 13, 2009 12:19 PM
M.A.Sharma "सेहर" said...
सुंदर अभिव्यक्ति
अन्तिम कुछ पंक्तियाँ तो गूढ़ अर्थों के साथ
अद्भुत रही विनय जी !!
सादर !!
February 13, 2009 1:02 PM
praveen Parashar said...
badiya bahut hi accha hai ....
February 13, 2009 1:08 PM
तपन शर्मा said...
गुलाब की पंखुड़ी को जीवन के हर पड़ाव से आपने बखूबी जोड़ा है..
सहेज कर रखने वाली कविता है ये...
धन्यवाद
February 14, 2009 12:12 AM
परमजीत बाली said...
बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।
धनुष देह श्वेत केश
झुर्रियां कपोल पर
समय हाथी रौंद गया
पंखुडी गुलाब की।
February 14, 2009 12:54 AM
shyamskha shyam said...
धनुष देह श्वेत केश
झुर्रियां कपोल पर
समय हाथी रौंद गया
पंखुडी गुलाब की।
सुन्दर अभिव्यक्ति पर बधाई
श्याम सखा श्याम
February 14, 2009 11:47 AM
Anonymous said...
shaandaar
meethimirchi.blogspot.com
February 15, 2009 1:08 AM
संदीप तिवारी said...
maza aa gaya bhai saab... aapne kamal kar diya...dil ko chho gayi pankhudi gulab ki..
February 15, 2009 1:14 AM
Dixant Tiwari (soni) said...
dil ko choo gai
pankhudi gulaab ki
February 15, 2009 1:16 AM