सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

बोनसाई


क्या पेड भी
कभी करते है अपराध..... ?
अगर नहीं तो
क्यूँ बना दिये जाते है बोनसाई....?
ना पिपिलिका थपकियां
ना कोयल की लौरियां
ना पतझड का वस्त्रदान
ना बंसंत का धूपस्नान
ना छाह ना राह
ना टोही ना बटोही
ना प्रेमासिक्त पुकार
ना वृषभ हुँकार
ना गर्द ना गर्दी
ना गर्मी ना सर्दी
ना श्रमिक ना कलेवा
ना गडरिये ना सिंदूरदेवा
ना तमगे सा आईना
दाढी बनवाता गंवई ना
ना शिखर गरूड चिंतन
ना धरा संत मंथन
प्रकृति कभी
गलत ना रचती
जो कुछ है वह सही है
स्वर्ग का तो पता नहीं
कद्दावरों का
नर्क है तो बोनसाई है।
लुभाते भाते सबको
पर किस्मत
सलौनी नहीं होती
कद छोटा होता है
पर महसूसियत
बोनी नहीं होती

3 टिप्‍पणियां:

रचना गौड़ ’भारती’ ने कहा…

ब्लोगिंग जगत मे स्वागत है ।
सुंदर रचना के लिए बधाई एंव शुभकामनाएं ।
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
www.zindagilive08.blogspot.com
आर्ट के लि‌ए देखें
www.chitrasansar.blogspot.com

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर ने कहा…

bahut khub, narayan narayan

अजित गुप्ता का कोना ने कहा…

विनय जी
ब्‍लाग में दिखायी देते हैं, कभी वैसे भी मिल लीजिए। मैंने एक-दो बार आपको फोन करने का प्रयास भी किया लेकिन आपका फोन नम्‍बर शायद सही नहीं था। मेरा मोबाइल न. है 9414156338



भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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