शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

माँ कभी बीमार नही होती


*
क्या पता
सोती भी है या नही ,
जब मैं सोता ,
वह जगी होती ,
जब मैं जगता , वह
झाडू - पानी -सफाई कर ,
फूंकनी ले ,
चुल्हे के पडौस में
बैठी होती ,
कभी घट्टी पर ,
कभी गौशाला में ,
गुदडियों को सुई चुभोती ,
ढिबरी में तेल भर
उजाला करती ,
दिन भर
कुछ ना कुछ करती ही रहती ,
मुझे बुखार आता ,
दद्दू खटियां पर पडे रहते ,
बाबा खांसते- खांसते दुहरा जाते....
पर , पर माँ कभी बीमार नही होती
फ़िर भी.........
फिर भी ना जाने
जल्दी .....
मर क्यूं जाती है ?

2 टिप्‍पणियां:

योगेश समदर्शी ने कहा…

बहुत खूब, बहुत अच्छी रचना. भवुक कर दिया आपने... बधाई...

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सही चरित्र चित्रण है मां का ....बहुत बढिया लिखा।



भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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