भूकंप
जो पिछले दिनों
आया था शहर में
कुछ ज्यादा ही
जोर से था
मैं तो जलजले की
अभ्यस्त थी पर
मकान में दरारे आ गई
कुछ दिनों बाद
एक कारीगर बुलाया
और मरम्मत करवा दी
जाते-जाते उसने कहा .....
दरारों मे भरी सीमेंट की
तराई करना |
पानी की धार को
सीमेंट ने
एकदम सोंख लिया
मुझे अपने
शहीद बेटे का
पहला दूध पीना
याद आ गया |
फिर तराई के लिए
पानी की जरुरत न रही |
मंगलवार, 27 जनवरी 2009
हर दुखी का दुखडा मैं था
दर्पण में दिखता
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता |
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से |
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से |
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से |
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ |
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ |
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को |
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था |
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था |
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था |
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया |
मुझ से
परे निकल
"मैं" पा गया |
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता |
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से |
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से |
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से |
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ |
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ |
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को |
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था |
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था |
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था |
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया |
मुझ से
परे निकल
"मैं" पा गया |
सोमवार, 26 जनवरी 2009
मेरा कद
एक सुबह उठा
तो मेरा कद खो गया
मैं हतप्रभ
अब कैसे काम चलेगा
मैं बौना या सामने वाला
कैसे पता लगेगा
अपने कद की तुलना में
औरों के कद
आंक रखे थे
स्वार्थ के पैमाने पर
सबको नाप रखे थे
कौन मेरे पीछे और
किसके पीछे मैं
पूँछ हिलाऊँगा
इसका बोध खो गया
हे भगवान
एक ही रात में
क्या से क्या हो गया
कद का यह भ्रमजाल
मेरा उसका आपका नहीं सबका है
पेश है एक शब्दचित्र
जिसमें नाम फकत मेरा है
शहर से दूर था वह कॉलेज
जिसमें मैं पढ़ता था
कुछ पैदल कुछ
साइकिलों पर आते
मैं पैदल..........
हसरत से देखता साइकिल को
परीक्षा के दिन
एक सेठ पुत्र ने
साइकिल पर बिठा दिया
परीक्षा से महत्वपूर्ण
साइकिल की सवारी होगई
जीवन में पहली बार लगा
मेरा भी कुछ कद है
फिर नौकरी की साइकिल खरीदी
अच्छा लगा
स्कूटर बगल से गुजरता तो
मायूस हो जाता
कद कुछ कम हो जाता
बुढापे मे मोपेड खरीदी
तीस की गति पर
हवाई जहाज का आनंद लिया
पैदल और साइकिल सवारों को देख
नाक-भौं सिकोड़ता
चलने का शउर नहीं
बार-बार ब्रेक लगाना पड़ता है
कद बढ़ने का भ्रम जारी रहा
फिर एक दिन पौत्री ने कहा
दादाजी मम्मी को बैंक से लोन मिला है
घर में कार लायेंगे और
आपको भी खूब घुमायेंगे
पुत्र की भक्ति
पुत्रवधू की श्रद्धा
या दादाजी पर दया
कुछ भी हो
कार की कल्पना ने
कुल मिलाकर मेरा कद
कुछ और बढ़ा ही दिया
और अब चतुर्थ आश्रम
चला चली की तैयारी
कन्धों की सवारी की प्रतिक्षा
लोग कह रहे हैं
पांव विमान से बाहर है
इन्हें ढँकों.......
मेरा कद ......?
शनिवार, 17 जनवरी 2009
एकाकी
चला गया मुझको ठुकरा कर
कौन रहा सदा अपना
भौर भये जैसे कोई
टूट गया मीठा सपना
-
खोटा सौदा बनी जिन्दगी
बिखर गए सच्चे आने
उखड़ी सांसे थाम खड़ी है
जिंदा मौत सिरहाने
-
तन के तीरथ कब के उजडे
मांस विहीन अस्थि पत्थर
उजड़ी आँखे साए तकती
फटी बिवाई पग थर थर
-
खून के रिश्ते कब के रिस गए
टूट गए कच्चे धागे
एकाकी जीवन का बीहड़
पसरा है इसके आगे
साँस्कृतिक दमन
दो फूल उगे,
मुस्कराये,
आंखें खोली,
मां के आंचल में
अमृत चखा,
घुटने चले
थोडी दूर,
और गली के
गुलमोहर हो गये ।
फ़िर हुआ आक्रमण
ध्वनी तरंगो का
ठिठके और भाग लिये
घर के भीतर,
टकटकी लगाये
देखने लगे
रोशन आयत ।
यकायक
हाथों में उग आये
गिल्ली डंडे की जगह
बन्दुक और चाकू,
अमृत कलश
जहरीले कौतुक बन गये
खत्म हो गया
जड और चेतन में फ़र्क ।
लहुलुहान पर्दे पर
उभर आया
आप देख रहे है
फ़लाना नेटवर्क ।
मुस्कराये,
आंखें खोली,
मां के आंचल में
अमृत चखा,
घुटने चले
थोडी दूर,
और गली के
गुलमोहर हो गये ।
फ़िर हुआ आक्रमण
ध्वनी तरंगो का
ठिठके और भाग लिये
घर के भीतर,
टकटकी लगाये
देखने लगे
रोशन आयत ।
यकायक
हाथों में उग आये
गिल्ली डंडे की जगह
बन्दुक और चाकू,
अमृत कलश
जहरीले कौतुक बन गये
खत्म हो गया
जड और चेतन में फ़र्क ।
लहुलुहान पर्दे पर
उभर आया
आप देख रहे है
फ़लाना नेटवर्क ।
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