मंगलवार, 27 जनवरी 2009

हर दुखी का दुखडा मैं था

दर्पण में दिखता
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता |
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से |
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से |
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से |
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ |
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ |
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को |
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था |
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था |
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था |
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया |
मुझ से
परे निकल
"मैं" पा गया |


भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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