शनिवार, 17 जनवरी 2009

एकाकी

चला गया मुझको ठुकरा कर
कौन रहा सदा अपना
भौर भये जैसे कोई
टूट गया मीठा सपना
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खोटा सौदा बनी जिन्दगी
बिखर गए सच्चे आने
उखड़ी सांसे थाम खड़ी है
जिंदा मौत सिरहाने
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तन के तीरथ कब के उजडे
मांस विहीन अस्थि पत्थर
उजड़ी आँखे साए तकती
फटी बिवाई पग थर थर
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खून के रिश्ते कब के रिस गए
टूट गए कच्चे धागे
एकाकी जीवन का बीहड़
पसरा है इसके आगे

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भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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