दो फूल उगे,
मुस्कराये,
आंखें खोली,
मां के आंचल में
अमृत चखा,
घुटने चले
थोडी दूर,
और गली के
गुलमोहर हो गये ।
फ़िर हुआ आक्रमण
ध्वनी तरंगो का
ठिठके और भाग लिये
घर के भीतर,
टकटकी लगाये
देखने लगे
रोशन आयत ।
यकायक
हाथों में उग आये
गिल्ली डंडे की जगह
बन्दुक और चाकू,
अमृत कलश
जहरीले कौतुक बन गये
खत्म हो गया
जड और चेतन में फ़र्क ।
लहुलुहान पर्दे पर
उभर आया
आप देख रहे है
फ़लाना नेटवर्क ।
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