मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,
जिसे पढ़ते ही नजरे थूक दे
पाठक निम्बोली बन जाये,
रोम रोम जिस्म में घुसता कड़वापन
अब बर्दास्त नहीं होता
अंतस की निर्वासित मिठास लापता है
हर रोज जगती थी
आत्मह्त्या के सपनों के साथ
सुना है सुबह के सपने सच होते है
और अब बंगलादेशी घुसपेठियों की तरह
पसरती कड़वाहट का
जिस्म के मुल्क पर आधिपत्य है
आस्था से व्यवस्था तक
कड़वाहट की एक मोटी परत जम चुकी है
लेकिन अब जगह नहीं बची जिस्म में
निगाहों में समाती है तो
जुबा से निकल पड़ती है
निगाहें और जुबा बंद करनी पड़ती है तो
कागज़ पर छलक जाती है
कड़वाहट की खरपतवार अब
मुख्य फसल हो गयी है
मेरे अन्दर का ढोर इसे चर चर के
बहुत मोटा ताज़ा हो गया है
इतना सब होने पर भी
आशा की एक किरण बाकी है
जैसे बुजुर्ग डायरी में 'राम राम' लिखते है
मेरी भी 'मीठा मीठा' लिखने की इच्छा होती है
*
विनय के जोशी
गुरुवार, 4 नवंबर 2010
रविवार, 19 सितंबर 2010
माँ

जब धूप पसर जाती
रसोईघर के बाहर
मैं वहां बैठ
अ से अम्मा
लिखा करता
माँ धुएँ के कोहरे में
गुनगुनाती
आटा गूंथती
रोटियां बेलती
और साथ ही बनाती
आटे की छोटी-छोटी गोलियां
फिर उन्हें
आँगन में फैला देती
एक-दो-तीन
कई चिडियां आती
चहचहाती
गोलियां चुगती
सजीव हो जाते
बेलन, कलछी, चिमटा
अग्नि नृत्य करती
चूल्हे की मुंडेर पर
रसोईघर जलसाघर हो जाता
.
अब न घर में माँ हैं
न शहर में चिडियां
बस केवल
आटे की गोलियां बची है
जब कभी तन्हा होता हूँ
कुछ गोलियां बिखेर देता हूँ
और माँ
चिडियां बन
मन के आँगन में
उतर आती है
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
लफ़्जों के तस्कर आबाद यहां
सीता अब लकीर नहीं रखती
द्रोपदी भी चीर नहीं रखती
.
रंभा, मेनका, उर्वशी तो है
जन्नते हुस्न हीर नहीं रखती
.
दौलत ऐ खुदगर्जी हो तो दस्तक दें
राजनीति फ़कीर नहीं रखती
.
लफ़्जों के तस्कर आबाद यहां
यह गली अब मीर नहीं रखती
.
जेरो-जबर ना काफ़िया पेमा
विशेष कलम जंजीर नहीं रखती
.
द्रोपदी भी चीर नहीं रखती
.
रंभा, मेनका, उर्वशी तो है
जन्नते हुस्न हीर नहीं रखती
.
दौलत ऐ खुदगर्जी हो तो दस्तक दें
राजनीति फ़कीर नहीं रखती
.
लफ़्जों के तस्कर आबाद यहां
यह गली अब मीर नहीं रखती
.
जेरो-जबर ना काफ़िया पेमा
विशेष कलम जंजीर नहीं रखती
.
शुक्रवार, 4 जून 2010
यादें / फना होते बादल

यादें / फना होते बादल
*
मैं दिन में
सपने देखता था,
क्यूँ कि ,
जलाना होता था उन्हें,
रातों को रोशन करने के लिए |
गर रातें रोशन न होती तो,
कैसे पढ़ पाती मेरी उंगलियाँ वे इबारतें ,
जो तुम्हारी आँखों ने,
मेरी पीठ पर लिखी थी |
कैसे देखा पाता वह सोंधी महक,
जो तुम आँगन के नीम पर
टांग कर चली गई थी |
इतना ही नही,
रात भर जो डाकियाँ,
दौड़ता रहता था धड़कनों की चिट्ठियां बांटने,
उसे भी तो हांशियें पर उग आये
काँटों से बचाना होता था |
सिसकियाँ रेंगती थी हलक से पलक तक ,
उन्हें टूटे अधरों की
किरचों से बचाना था |
काल के कारखाने के,
सभी कल पुर्जे ठीक ही काम कर रहे थे
लेकिन ,
उम्र के हिमनद क्या करे जो
चुपचाप पसरता चला गया और,
मन की सरकार ने
यादों की खेती
अवैध घोषित कर दी
बस ! मैंने भी
बंद कर दिया ,
दिन में सपने देखना
अब मैं,
रातों को सपने देखता हूँ
और दिन में गमछे सा
कंधे पर टांक देता हूँ,
पसीना पोंछने के लिए |
*
विनय के जोशी
रविवार, 2 मई 2010
अजन्मी
अजन्मी
*
जर्जर काया
पराश्रित जीवन
बुढ़ापा भारी
उस पर नारी....
मैं कौन ?
मेरी ख्वाहिशें क्या ?
अधेड़ प्रौढ़ा
कुल की माया
नाती-पोतों की आया
उपेक्षा के बदले
वारी वारी ........
लहलहाती फसल
खनकता कुन्दन
शृंगारित दासी
जर जमीन जोरू
जागीरदारी ........
आदमखोर स्वछंद
मासूम कैद
संभल कर चलो
ओ नारी !
अभी हो कुंवारी ....
दूध भैया का .....
खिलौने भैया के ......
स्कूल भैया जाएगा ..........
उफ !
बहुत बुरा है,
दो पैरों का जानवर
अपनी मादा के साथ |
शुक्र है मैं मुक्त हूँ
उन्मुक्त हूँ
जीवन रहा नही
मरण वार दिया
तन तरिणी
वन्ही (अग्नि) सागर
पल में पार किया ...
सांसें लेती
लाशों ने मुझे
कोख ही मे मार दिया
*
vinay k joshi
*
जर्जर काया
पराश्रित जीवन
बुढ़ापा भारी
उस पर नारी....
मैं कौन ?
मेरी ख्वाहिशें क्या ?
अधेड़ प्रौढ़ा
कुल की माया
नाती-पोतों की आया
उपेक्षा के बदले
वारी वारी ........
लहलहाती फसल
खनकता कुन्दन
शृंगारित दासी
जर जमीन जोरू
जागीरदारी ........
आदमखोर स्वछंद
मासूम कैद
संभल कर चलो
ओ नारी !
अभी हो कुंवारी ....
दूध भैया का .....
खिलौने भैया के ......
स्कूल भैया जाएगा ..........
उफ !
बहुत बुरा है,
दो पैरों का जानवर
अपनी मादा के साथ |
शुक्र है मैं मुक्त हूँ
उन्मुक्त हूँ
जीवन रहा नही
मरण वार दिया
तन तरिणी
वन्ही (अग्नि) सागर
पल में पार किया ...
सांसें लेती
लाशों ने मुझे
कोख ही मे मार दिया
*
vinay k joshi
नमो चक्रधर
नमो चक्रधर
*
हिमालय से
सरके
हिमप्रस्तर
मौन मानुष
हिमनद
पिघल कर
सतत प्रवाही
माँ हो गए
तह अंगीकार विकार
सतह अमृत सिंचन
जलधि हिय समा
हवा की पालकी संग
कण कण तुषार
फिर हिमालय हो गए
सर्वत्र
यही परिलक्षित
अणु से आकाशगंगा
अनंत
अनिवारित चक्राधीन
*
विनय के जोशी
*
हिमालय से
सरके
हिमप्रस्तर
मौन मानुष
हिमनद
पिघल कर
सतत प्रवाही
माँ हो गए
तह अंगीकार विकार
सतह अमृत सिंचन
जलधि हिय समा
हवा की पालकी संग
कण कण तुषार
फिर हिमालय हो गए
सर्वत्र
यही परिलक्षित
अणु से आकाशगंगा
अनंत
अनिवारित चक्राधीन
*
विनय के जोशी
बुधवार, 24 फ़रवरी 2010
तड़ित

आज की जिंदगी
इस कदर टुकड़ों में बंट गई है
कि इंसान की मौत मैं भी,
पूर्णता नहीं रह गई है.
हजारो में से कोई एक
सम्पूर्ण मौत मरता होगा
और मरने के बाद खुद भी,
अपनी मौत पर गर्व करता होगा .
अरे ! आज कल एक साथ
पूरी मौत होती ही कंहा है ?
टुकडे टुकडे मौत की
किरचे समेटती
लहुलुहान रूह को
पता ही नहीं चलता
कब मासूमियत की मौत हुई
कब अच्छाई, इमानदारी
पवित्रता और खुद्दारी कल बसी,
कब चल बसा,
बचपन का भोलापन,
यौवन का उत्साह
झूठ बोलते है सब,
हर एक को पता है ,
कंहा और कब कितनी मोते हुई,
कब चाँदी के टुकड़ो खातिर मरा
कब जिंदगी बिगाड़ी, ज़िन्दगी बनाने खातिर
मानव गोस्त और सत्ता वेश्या के लिए तो
कदम कदम पर ख़ुदकुशी होती रही,
दोष किसका ?
बचपन में, सो जा - नहीं तो शेर आ जाएगा से,
खंडित विश्वास को
कई हमसफ़र मिलते चले गए और
इस देह मंदिर से मूल्य रिसते चले गए.
जब आस्था और विश्वास ही
मुर्दा हो तो,
इंसान ज़िंदा नहीं होता,
जिस्मों में आत्म उद्वेलित
तड़ित न हो तो,
स्पंदन पैदा नहीं होता
लाशो के समागम से
जीवन पैदा नहीं होता
*
विनय के जोशी
बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
1411
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
दिनकर कभी अस्त नहीं होता

मौज का महल ध्वस्त नहीं होता
नूरे मुन्तजिर पस्त नहीं होता
शब् धरती की अपनी करनी है
दिनकर कभी अस्त नहीं होता
ज़ुल्म कही भी हो व्यथित होता है
सुखनवर कभी व्यस्त नहीं होता
झुकता रहा सज़दे में हरबार मगर
कही सर तो कही दस्त नहीं होता
फकीरी नहीं होती हमसफ़र जिसकी
शाह होता है मगर मस्त नहीं होता
बेतरतीब अश'आर पेश है, हर कोई
वियाकरण का अभ्यस्त नहीं होता
लती मतलबी

ईश्वर को
ऊँगली दिखाता
व्योम छिद्रान्वेषी
टावर,
प्रतिपल बताता
मौसम की जानकारी
चाँद पर पानी के सबूत
भूकंप,
सूनामी,
बवंडर के जमाखर्च
सास बहु के झगड़ों की
पेचीदगियां और तफसील,
बोरवेल में फसे बच्चों के
जिंदगी और मौत के
टूर्नामेंट की लाइव कवरेज,
जनप्रतिनिधियों में
रुस्तम ए हिंद
दंगल के दांवपेंच,
रजत पटल की कालिख,
जांच कमिशनों का
भाषण चाटण ठठ्ठा,
शेर बाज़ार का सट्टा,
तेजी मंदी के आनंदी,
भालू और नंदी
कुछ भी ना छूटा
उसकी पकड़ से,
बस छूट गए
ढीले होते पेच और
जड़ों में लगी जंग के
समाचार,
और एक रात
भरभरा कर गिर पडा,
झोंपड़पट्टी के
कुछ लोग दब कर मर गए,
लती चिल्ला उठे,
अरे! क्या हुआ ?
कंहा गए सिगनल ?
बिग बोस के घर से
कौन हुआ बेघर ?
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