मंगलवार, 29 जुलाई 2008

अश्रु सिंचन

भूकंप
जो पिछले दिनों
आया था शहर में
कुछ ज्यादा ही
जोर से था
मैं तो जलजले की
अभ्यस्त थी पर,
मकान में दरारे आ गई
कुछ दिनों बाद
एक कारीगर बुलाया
और मरम्मत करवा दी
जाते-जाते उसने कहा .....
दरारों मे भरी सीमेंट की
तराई करना |
पानी की धार को
सीमेंट ने
एकदम सोंख लिया
मुझे अपने
शहीद बेटे का
पहला दूध पीना
याद आ गया |
फिर तराई के लिए
पानी की जरुरत न रही |

सोमवार, 28 जुलाई 2008

जीवन

भीख में मिला
एक वस्त्र
जिसमे
धोखों के धागों से
टीसों के टांके लगे हैं
जख्मों से भरी जेब और
तन्हाईयों के तमगे लगे है
फ़िर भी
अनमोल है यह
समझ मेरी
कीमत न इसकी
आंक पाती है
क्यूंकि कभी कभी
नजर उनकी
सुई सी चुभती हुई
सुख का एक
बटन टांक जाती है |

अजन्मी

जर्जर काया
पराश्रित जीवन
बुढापा भरी
उस पर नारी .....
मैं कौन ?
मेरी ख्वाहिशे क्या ?
अधेड़ प्रौढ़|
कुल की माया
नाती-पोतों की आया
उपेक्षा के बदले
वारी वारी ........
लहलहाती फसल
खनकता कुन्दन
श्रंगारित दासी
जर जमीन जोरू
जागीरदारी ........
आदमखोर स्वछंद
मासूम कैद
संभल कर चलो
ओ नारी !
अभी हो कुंवारी ....
दूध भैया का .....
खिलौने भैया के ......
स्कूल भैया जाएगा ..........
उफ !
बहुत बुरा है,
दो पैरों का जानवर
अपनी मादा के साथ |
शुक्र है मैं मुक्त हूँ
उन्मुक्त हूँ
जीवन रहा नही
मरण वार दिया
तन तारिणी
वन्ही सागर
पल में पार किया ...
सांसें लेती
लाशों ने मुझे
कोख ही मे मार दिया

शनिवार, 26 जुलाई 2008

माँ

जब धूप पसर जाती
रसोईघर के बाहर
मैं वहां बैठ
अ से अम्मा
लिखा करता
माँ धुएँ के कोहरे में
गुनगुनाती
आटा गूंथती
रोटियां बेलती
और साथ ही बनाती
आटे की छोटी-छोटी गोलियां
फिर उन्हें
आँगन में फैला देती
एक-दो-तीन
कई चिडियां आती
चहचहाती
गोलियां चुगती
सजीव हो जाते
बेलन, कलछी, चिमटा
अग्नि नृत्य करती
चूल्हे की मुंडेर पर
रसोईघर जलसाघर हो जाता
.
अब न घर में माँ हैं
न शहर में चिडियां
बस केवल
आटे की गोलियां बची है
जब कभी तन्हा होता हूँ
कुछ गोलियां बिखेर देता हूँ
और माँ
चिडियां बन
मन के आँगन में
उतर आती है

पितृ क्रम

धीर गंभीर
गृहस्थ फकीर
सटीक मितभाषी
पद्कमल काशी
कसरती काया
बरगदी छाया
तार्किक दार्शनिक
आस्तिक वैज्ञानिक
एक उम्र गुजारी
पिता जैसा
बनने की कोशिश मे |
फ़िर एक दिन
एहसास हुआ
मैं तो
अपने पिता सा
ना बन पाया
मेरा बेटा
मुझ सा बन गया|
हम जो नही है
वह ही सच है
हम जो है
वह भ्रम है |
हर बेटा अपनी उम्र के
पचासवे बरस में
यह कविता लिखता है
यही जीवन क्रम है |

विस्तार संकुचन दैनिक भास्कर रसरंग २९/०६/२००८ को प्रकशित

दैनिक भास्कर रसरंग २९/०६/२००८ को प्रकशित

विस्तार संकुचन

.

कभी गोलू कभी गोटली

कभी पोलू कभी पोटली

कभी बिट्टू कभी किट्टू

कभी पठ्ठा कभी पप्पू

कह कर उसे बुलाता

और वह हर बार

हां पापा !

कह कर दौडा आता

और अब

कभी फादर कभी पापा

कभी ओल्डी कभी डैडी

कभी बाऊसा कभी बापू

कभी काकू कभी दादू

कह कर मुझे बुलाता

और मैं हर बार

हां बेटा !

कह कर दौडा आता

गुरुवार, 24 जुलाई 2008

हे कृष्णा.........


हे कृष्णा........
ये कैसी मृगतृष्णा

दस रचनायें
रखी सामने
एक नई तैयार
मौलिकता अब
बाजार में बिकती
सृजन बना व्यापार
हे कृष्णा.....
ये कैसी मृगतृष्णा

तारीफों के
टोकरे बटोरे
ख़रीदे पुरस्कार
झट गर्दन
घुसा लेते
जहाँ भी देखे हार
हे कृष्णा ....
ये कैसी मृगतृष्णा

लखपति
करोड़ चाहता
करोड़पति अनंत
मुद्रा पिपासु
सतत चलता
इसका आदि ना अंत
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

बड़ी बहन
असुंदर कह कर
छोटी को अपना ली
अब बड़ी
विशिष्ट लगाती
साधारण घरवाली
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

मची भगदड़
पंडितों मध्य
श्राध्दोत्सव के काज
यकृत हृदय
फेफड़े किडनी
उदर बन गए आज
हे कृष्णा ....
ये कैसी मृगतृष्णा

चंगों से नफरत
और दर्दी से
करते प्रेम
स्तेथोस्कोप को
कार्ड समझते
पेशेंट ए टी एम
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

जन्म से ही
दौड़ शुरू और
मृत्यु अन्तिम धाम
मन सीपी का
मोती उपेक्षित
प्यारा लगता चाम
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा
बहुत ढील दे दी तू ने
अब तो कुछ कसना
हे कृष्णा ...

राह थकन
पग छाले भूला
ले दर्शन की आस
उचक-उचक कर
नख-शिख देखूँ
फिर भी ना बुझती प्यास
हे कृष्णा ....
जीवन ज्योत
भले ही बुझ जाय
बनी रहे यह तृष्णा
हे कृष्णा .....

शनिवार, 19 जुलाई 2008

हिन्द-युग्म: हर दुखी का दुखड़ा मैं था

हिन्द-युग्म: हर दुखी का दुखड़ा मैं था
महिला श्रमिक

धड़ाधड़ उतर रही थी
कार से साड़िया रंग-बिरंगी
चश्मे-मोबाइल हाय-हेलो
हलचल मची थी

दो घड़ी छाया मिलती थी
आज वो भी नहीं है
क्या करे भाग्य पर
किसका वश है
बरामदे में मीटिंग है
आज महिला दिवस है

बोली वो दांतों से
घूँघट संभाले
चलो बहना आज
धूप में ही खालें

-विनय के॰ जोशी

बुधवार, 16 जुलाई 2008

बिजली पर कुछ क्षणिकाएँ :-
(१)
शतप्रतिशत
विद्युतीकरण
की प्राप्ति में
छोटी सी कमी
सरकार को
खली न थी
तार था
खम्भा था
बल्ब था
बिजली न थी
(२)
महाभारत
की कथा में
अचानक
सभी भक्तों की
खुशियाँ चली गई
चीर हरण के
दृश्य से पहले
बिजली चली गई
(३)
बिजली के जलते
बल्ब को देखो
कही खुशियाँ
एक स्विच की
मोहताज तो नही ?
(४)
केवल बिजली ही
काफी नही
रोशनी के लिए
अभय भी चाहिए
गुलेल और कंकर से
(५)
एकाकार
राजनीति और बाहुबली
मानों
करंट और बिजली-
.
विनय के जोशी

हिन्द-युग्म: अभी उठो! एक पेड़ लगा लो

हिन्द-युग्म: अभी उठो! एक पेड़ लगा लो


भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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