धीर गंभीर
गृहस्थ फकीर
सटीक मितभाषी
पद्कमल काशी
कसरती काया
बरगदी छाया
तार्किक दार्शनिक
आस्तिक वैज्ञानिक
एक उम्र गुजारी
पिता जैसा
बनने की कोशिश मे |
फ़िर एक दिन
एहसास हुआ
मैं तो
अपने पिता सा
ना बन पाया
मेरा बेटा
मुझ सा बन गया|
हम जो नही है
वह ही सच है
हम जो है
वह भ्रम है |
हर बेटा अपनी उम्र के
पचासवे बरस में
यह कविता लिखता है
यही जीवन क्रम है |
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