शनिवार, 26 जुलाई 2008

माँ

जब धूप पसर जाती
रसोईघर के बाहर
मैं वहां बैठ
अ से अम्मा
लिखा करता
माँ धुएँ के कोहरे में
गुनगुनाती
आटा गूंथती
रोटियां बेलती
और साथ ही बनाती
आटे की छोटी-छोटी गोलियां
फिर उन्हें
आँगन में फैला देती
एक-दो-तीन
कई चिडियां आती
चहचहाती
गोलियां चुगती
सजीव हो जाते
बेलन, कलछी, चिमटा
अग्नि नृत्य करती
चूल्हे की मुंडेर पर
रसोईघर जलसाघर हो जाता
.
अब न घर में माँ हैं
न शहर में चिडियां
बस केवल
आटे की गोलियां बची है
जब कभी तन्हा होता हूँ
कुछ गोलियां बिखेर देता हूँ
और माँ
चिडियां बन
मन के आँगन में
उतर आती है

9 टिप्‍पणियां:

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

बहुत भावनात्मक रचना है।

जब कभी तन्हा होता हूँ
कुछ गोलियां बिखेर देता हूँ
और माँ
चिडियां बन
मन के आँगन में
उतर आती है
दिशाएं

राज भाटिय़ा ने कहा…

सुन्दर कविता, बहुत से भाव लिये, धन्यवाद

Sajeev ने कहा…

नए ब्लॉग की बधाई, बहुत ही सराहनीय प्रयास, सक्रिय लेखन से हिन्दी चिट्टा जगत को समृद्ध करें....
आपका मित्र -
सजीव सारथी
9871123997
www.podcast.hindyugm.com

समय चक्र ने कहा…

हिन्दी ब्लॉग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है .
महेंद्र मिश्रा
समयचक्र

Vinay ने कहा…

क्या बात है! शानदार भई!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

main bhi maa hun n,aankhon se aansu tapak pade,
bahut aashish,itna hi achha likhte rahen

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

सुन्दर है भाविभिव्यक्ति

Amit K Sagar ने कहा…

बहुत बढिया कविता. लिखते रहिये.
---
उल्टा तीर

सरस्वती प्रसाद ने कहा…

अम्मा , माँ अपने में एक सम्पूर्ण संसार है
और उसके बारे में कलम हमेशा जीत जाती है....
खुश रहो...



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