महिला श्रमिक
धड़ाधड़ उतर रही थी
कार से साड़िया रंग-बिरंगी
चश्मे-मोबाइल हाय-हेलो
हलचल मची थी
दो घड़ी छाया मिलती थी
आज वो भी नहीं है
क्या करे भाग्य पर
किसका वश है
बरामदे में मीटिंग है
आज महिला दिवस है
बोली वो दांतों से
घूँघट संभाले
चलो बहना आज
धूप में ही खालें
-विनय के॰ जोशी
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