मार्ग अंधेरा हो गया, अभी तो है मंझधार
नैय्या फसी तूफान में, खेवय्या उस पार
रोज निहारे रूप को, इतराये हर बार
बिन श्रृंगार सीरत रही, कदरदान उस पार
मन का विहग कब का उड़ा तन तन्हा लाचार
तैरना ना जानू मैं सखी, सजन खडे उस पार
हाथ बढा हक छीन ले, सच्चाई हथियार
क्यूं लाचारी ऒढ तू, आस तके उस पार
भक्ति शक्ति शतगुनी, बिन पूंजी व्यापार
जितनी चाहे निपज लो, खरीददार उस पार
तिनके तिनके जमा किये, ले न सके आकार
नव सृजन फिर शुरू करे, आऒ चले उस पार
बुधवार, 27 अगस्त 2008
मंगलवार, 26 अगस्त 2008
कामचोर
हृदय कुछ
कमजोर हो गया है ।
पूरी क्षमता से
काम नही करता,
शायद कामचोर हो गया है ।
किडनी भी
ठीक नही रहती,
डॉक्टर की निग़ाह पर है ।
औरत मर्द एक से दिखते,
बच्चे बन्दर गढ लेती है ।
थक सी गई है आँखे,
कुछ का कुछ पढ लेती है ।
इतने कामचोरों संग रह कर,
आत्मावलोकन कर लेता हूँ ।
पछतावे से हर पल बोझल,
अपनी नज़रे भर लेता हूँ ।
मुझे याद आते वह पल,
जब हम केंटीन में सोते थे ।
घंटों खिड़की पर लाईन लगा कर,
लोग किस्मत को रोते थे ।
काम करता मेरे हिस्से का,
लम्हा-लम्हा छीजता था ।
जाने कौन स्वेद कणों से
मेरी तनख़ा सींचता था ।
कमजोर हो गया है ।
पूरी क्षमता से
काम नही करता,
शायद कामचोर हो गया है ।
किडनी भी
ठीक नही रहती,
डॉक्टर की निग़ाह पर है ।
औरत मर्द एक से दिखते,
बच्चे बन्दर गढ लेती है ।
थक सी गई है आँखे,
कुछ का कुछ पढ लेती है ।
इतने कामचोरों संग रह कर,
आत्मावलोकन कर लेता हूँ ।
पछतावे से हर पल बोझल,
अपनी नज़रे भर लेता हूँ ।
मुझे याद आते वह पल,
जब हम केंटीन में सोते थे ।
घंटों खिड़की पर लाईन लगा कर,
लोग किस्मत को रोते थे ।
काम करता मेरे हिस्से का,
लम्हा-लम्हा छीजता था ।
जाने कौन स्वेद कणों से
मेरी तनख़ा सींचता था ।
रविवार, 24 अगस्त 2008
सरल बात
सतत प्रयासरत रहते जो
मनुज सदा सराहे जाते
छोटे छोटे कदमो से ही
पर्वत पार कर वो जाते
बूंद बूंद से बादल बन
सम्पूर्ण धरा पर छा जाते
छोटे छोटे लक्ष्यों से ही
लक्ष्य बड़ा सहज पा जाते
.
मुस्कराहट विजय आहट
लघुता से विस्तार पाते
जितना झुके उतना उठे
आदर दे आदर है पाते
कमी खोजते अपने भीतर
बाहर भूरी प्रशंसा पाते
अच्छाई अनुगूँज अनोखी
दिग् दिगन्त द्विगुणित पाते
मनुज सदा सराहे जाते
छोटे छोटे कदमो से ही
पर्वत पार कर वो जाते
बूंद बूंद से बादल बन
सम्पूर्ण धरा पर छा जाते
छोटे छोटे लक्ष्यों से ही
लक्ष्य बड़ा सहज पा जाते
.
मुस्कराहट विजय आहट
लघुता से विस्तार पाते
जितना झुके उतना उठे
आदर दे आदर है पाते
कमी खोजते अपने भीतर
बाहर भूरी प्रशंसा पाते
अच्छाई अनुगूँज अनोखी
दिग् दिगन्त द्विगुणित पाते
शनिवार, 23 अगस्त 2008
एक और दिन उगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
लो फिर शुरु हुआ
झुठ कहने और
सुनने का सिलसिला
मन एकाकी औरा ओढे
जन अरण्य मे
भटकने का सिलसिला
विवेक, ह्र्दय, सत्य सोया
बस स्वार्थ है जगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
लो फिर शुरु हुआ
झुठ कहने और
सुनने का सिलसिला
मन एकाकी औरा ओढे
जन अरण्य मे
भटकने का सिलसिला
विवेक, ह्र्दय, सत्य सोया
बस स्वार्थ है जगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
मंगलवार, 19 अगस्त 2008
शुक्रवार, 15 अगस्त 2008
आगे बढ़ता देश हमारा
एक जर्जरित फ्रॉक में
दूसरा उघाड़े बदन
चमड़ी पर मेल की पपड़ियाँ
कूल्हे पर फटी निक्कर
गटर की अविरल धारा
कभी बोतल मिल जाती
कभी मिल जाता
पेप्सी का खाली टिन
दौड़ कर किनारे
बोरी के खजाने में
जमा कर आते
खुश हो जाते
दुगुने उत्साह से
फिर लग जाते
नज़र पड़ी
बहते आधे खाए सेव पर
हाथ से पोंछा
कुछ ख़ुद खाया
कुछ उसे दिया
खाली पेट में कुछ गया
तभी हाथ में पकड़ी
लकड़ी से अटक गया
रंग-बिरंगा एक कपड़ा
डंडा बन गया झंडा
करते कीचड़ में धमाल
अबोध भाई-बहन
संवेद स्वर में गाते रहे
झंडा ऊँचा रहे हमारा
आगे बढ़ता देश हमारा
दूसरा उघाड़े बदन
चमड़ी पर मेल की पपड़ियाँ
कूल्हे पर फटी निक्कर
गटर की अविरल धारा
कभी बोतल मिल जाती
कभी मिल जाता
पेप्सी का खाली टिन
दौड़ कर किनारे
बोरी के खजाने में
जमा कर आते
खुश हो जाते
दुगुने उत्साह से
फिर लग जाते
नज़र पड़ी
बहते आधे खाए सेव पर
हाथ से पोंछा
कुछ ख़ुद खाया
कुछ उसे दिया
खाली पेट में कुछ गया
तभी हाथ में पकड़ी
लकड़ी से अटक गया
रंग-बिरंगा एक कपड़ा
डंडा बन गया झंडा
करते कीचड़ में धमाल
अबोध भाई-बहन
संवेद स्वर में गाते रहे
झंडा ऊँचा रहे हमारा
आगे बढ़ता देश हमारा
सोमवार, 11 अगस्त 2008
अजाना गाँव
पलक झपकी
बीत गये
जाने कितने बसन्त
व्यतित होंगे
और कितने
आ जायेगा अन्त
मील के पत्थर
त्वरित आते
गुजर जाते
वर्तमान की झोली
खाली ही पाते
केश मन को
स्याह कर
जाने कब
धवल हो गये
शीशे की दीवारों में
कैद चक्षु कमल
हो गये
चिकने गाल मैदान
नालियों में
ढल गये
स्वार्थ रंजित
मीठे बोल
गालियों में
बदल गये
लाचारी अधर धर
दंत पंक्ति खो गई
तीर सी सधी काया
ढीला धनुष हो गई
मोह का सहरा
रेणु धंसते
पांव है
ना जाने अब दूर कितना
अबुझ अजाना
गांव है
बीत गये
जाने कितने बसन्त
व्यतित होंगे
और कितने
आ जायेगा अन्त
मील के पत्थर
त्वरित आते
गुजर जाते
वर्तमान की झोली
खाली ही पाते
केश मन को
स्याह कर
जाने कब
धवल हो गये
शीशे की दीवारों में
कैद चक्षु कमल
हो गये
चिकने गाल मैदान
नालियों में
ढल गये
स्वार्थ रंजित
मीठे बोल
गालियों में
बदल गये
लाचारी अधर धर
दंत पंक्ति खो गई
तीर सी सधी काया
ढीला धनुष हो गई
मोह का सहरा
रेणु धंसते
पांव है
ना जाने अब दूर कितना
अबुझ अजाना
गांव है
रविवार, 10 अगस्त 2008
तरक्की
हुबहू जिस्म जैसी
मशीन बनाना
जटिल और खर्चीला था
इसलिए जिस्म को ही
मशीन बनाना
तय किया गया
पहले चरण में
नंगेपन से
पाबन्दी हटाई गई
अवाम हक्का-बक्का
शहर बदहवास
निगाहें निगरा की
हवाइयां उड़ी हुई
एक युवक
बाज़ार में दिगम्बर दौड़ा
फ़िर एक तन्वी भी
दफ़न था जो जहन में
हरकत में आने लगा
शर्मीले खुलकर बतियाने लगें
खवातीन गहने की तरह
नंगापन सजाने लगीं
बुजुर्ग ज़माने को
कोसते-खासते
मजा लेने लगें
इसतरह नंगापन
जिस्म पर ही नहीं
रूह में भी पसरता चला गया
अब नंगापन
आम बात है
और जमाना मुकम्मल
तरक्की की राह पर है |
मशीन बनाना
जटिल और खर्चीला था
इसलिए जिस्म को ही
मशीन बनाना
तय किया गया
पहले चरण में
नंगेपन से
पाबन्दी हटाई गई
अवाम हक्का-बक्का
शहर बदहवास
निगाहें निगरा की
हवाइयां उड़ी हुई
एक युवक
बाज़ार में दिगम्बर दौड़ा
फ़िर एक तन्वी भी
दफ़न था जो जहन में
हरकत में आने लगा
शर्मीले खुलकर बतियाने लगें
खवातीन गहने की तरह
नंगापन सजाने लगीं
बुजुर्ग ज़माने को
कोसते-खासते
मजा लेने लगें
इसतरह नंगापन
जिस्म पर ही नहीं
रूह में भी पसरता चला गया
अब नंगापन
आम बात है
और जमाना मुकम्मल
तरक्की की राह पर है |
गुरुवार, 7 अगस्त 2008
कांटा
थम जाते हैं कदम
मेरे लिए
चेतना का हर पल
मुझे समर्पित है
हर आह
हर सिसकी
पर रहता है
मेरा नाम
लेकिन
चाहता है हर कोई
मुझे अपने से
अलग करना
नहीं कोई मैं हस्ती
कद में भी नाटा हूं
मैं जिस्म में
चुभा कांटा हूं
चीखों चिल्लाओं
कोहराम मचा दो
पर मुझे तो ना कोसो
अरे तुम्हें तो दर्द है
फकत मेरी चुभन का
मेरा तो
दम घुटा जा रहा है
तुम्हारे जिस्म में
मेरे लिए
चेतना का हर पल
मुझे समर्पित है
हर आह
हर सिसकी
पर रहता है
मेरा नाम
लेकिन
चाहता है हर कोई
मुझे अपने से
अलग करना
नहीं कोई मैं हस्ती
कद में भी नाटा हूं
मैं जिस्म में
चुभा कांटा हूं
चीखों चिल्लाओं
कोहराम मचा दो
पर मुझे तो ना कोसो
अरे तुम्हें तो दर्द है
फकत मेरी चुभन का
मेरा तो
दम घुटा जा रहा है
तुम्हारे जिस्म में
समय चक्र
बुधवार, 6 अगस्त 2008
बिजली : क्षणिकाएँ
:-
(१)
शतप्रतिशत
विद्युतीकरण
की प्राप्ति में
छोटी सी कमी
सरकार को
खली न थी
तार था
खम्भा था
बल्ब था
बिजली न थी
(२)
महाभारत
की कथा में
अचानक
सभी भक्तों की
खुशियाँ चली गई
चीर हरण के
दृश्य से पहले
बिजली चली गई
(३)
बिजली के जलते
बल्ब को देखो
कही खुशियाँ
एक स्विच की
मोहताज तो नही ?
(४)
केवल बिजली ही
काफी नही
रोशनी के लिए
अभय भी चाहिए
गुलेल और कंकर से
(५)
एकाकार
राजनीति और बाहुबली
मानों
करंट और बिजली-
(१)
शतप्रतिशत
विद्युतीकरण
की प्राप्ति में
छोटी सी कमी
सरकार को
खली न थी
तार था
खम्भा था
बल्ब था
बिजली न थी
(२)
महाभारत
की कथा में
अचानक
सभी भक्तों की
खुशियाँ चली गई
चीर हरण के
दृश्य से पहले
बिजली चली गई
(३)
बिजली के जलते
बल्ब को देखो
कही खुशियाँ
एक स्विच की
मोहताज तो नही ?
(४)
केवल बिजली ही
काफी नही
रोशनी के लिए
अभय भी चाहिए
गुलेल और कंकर से
(५)
एकाकार
राजनीति और बाहुबली
मानों
करंट और बिजली-
मंगलवार, 5 अगस्त 2008
मंहगाई
कोटिल्य भूले
वस्तु विनिमय छोडा
विश्व बैंक का अंकुश डाला
छतरी तोडी
चद्दर फाडा
भ्रष्टाचारी छत्र संभाला
भेडिया राजा
भेड़ रियाया
भीड़ भ्रामरी अकेले ताला
दिन दल्ले
रात पतुरिया
जिस्म जख्म अस्तित्व छाला
बकरी भगाई
चरखा तोडा
वैश्वीकरण का हाथी पाला
किया उत्सर्जन
तब चिल्लाये
हाय महंगाई मार डाला
वस्तु विनिमय छोडा
विश्व बैंक का अंकुश डाला
छतरी तोडी
चद्दर फाडा
भ्रष्टाचारी छत्र संभाला
भेडिया राजा
भेड़ रियाया
भीड़ भ्रामरी अकेले ताला
दिन दल्ले
रात पतुरिया
जिस्म जख्म अस्तित्व छाला
बकरी भगाई
चरखा तोडा
वैश्वीकरण का हाथी पाला
किया उत्सर्जन
तब चिल्लाये
हाय महंगाई मार डाला
शनिवार, 2 अगस्त 2008
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
Internationalized Domain Names
