मार्ग अंधेरा हो गया, अभी तो है मंझधार
नैय्या फसी तूफान में, खेवय्या उस पार
रोज निहारे रूप को, इतराये हर बार
बिन श्रृंगार सीरत रही, कदरदान उस पार
मन का विहग कब का उड़ा तन तन्हा लाचार
तैरना ना जानू मैं सखी, सजन खडे उस पार
हाथ बढा हक छीन ले, सच्चाई हथियार
क्यूं लाचारी ऒढ तू, आस तके उस पार
भक्ति शक्ति शतगुनी, बिन पूंजी व्यापार
जितनी चाहे निपज लो, खरीददार उस पार
तिनके तिनके जमा किये, ले न सके आकार
नव सृजन फिर शुरू करे, आऒ चले उस पार
3 टिप्पणियां:
Bahut sunder
मार्ग अंधेरा हो गया, अभी तो है मंझधार
नैय्या फसी तूफान में, खेवय्या उस पार
बहुत ही सुन्दर भाव, सुन्दर कविता के लिये
धन्यवाद
मन का विहग कब का उड़ा तन तन्हा लाचार
तैरना ना जानू मैं सखी, सजन खडे उस पार
तिनके तिनके जमा किये, ले न सके आकार
नव सृजन फिर शुरू करे, आऒ चले उस पार
BAHOT KHUB....
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