पलक झपकी
बीत गये
जाने कितने बसन्त
व्यतित होंगे
और कितने
आ जायेगा अन्त
मील के पत्थर
त्वरित आते
गुजर जाते
वर्तमान की झोली
खाली ही पाते
केश मन को
स्याह कर
जाने कब
धवल हो गये
शीशे की दीवारों में
कैद चक्षु कमल
हो गये
चिकने गाल मैदान
नालियों में
ढल गये
स्वार्थ रंजित
मीठे बोल
गालियों में
बदल गये
लाचारी अधर धर
दंत पंक्ति खो गई
तीर सी सधी काया
ढीला धनुष हो गई
मोह का सहरा
रेणु धंसते
पांव है
ना जाने अब दूर कितना
अबुझ अजाना
गांव है
1 टिप्पणी:
Vinay ji kya baat hai sabhi rachanaye ek se badhakar ek.
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