सोमवार, 11 अगस्त 2008

अजाना गाँव

पलक झपकी

बीत गये

जाने कितने बसन्त

व्यतित होंगे

और कितने

आ जायेगा अन्त

मील के पत्थर

त्वरित आते

गुजर जाते

वर्तमान की झोली

खाली ही पाते

केश मन को

स्याह कर

जाने कब

धवल हो गये

शीशे की दीवारों में

कैद चक्षु कमल

हो गये

चिकने गाल मैदान

नालियों में

ढल गये

स्वार्थ रंजित

मीठे बोल

गालियों में

बदल गये

लाचारी अधर धर

दंत पंक्ति खो गई

तीर सी सधी काया

ढीला धनुष हो गई

मोह का सहरा

रेणु धंसते

पांव है

ना जाने अब दूर कितना

अबुझ अजाना

गांव है

1 टिप्पणी:

Advocate Rashmi saurana ने कहा…

Vinay ji kya baat hai sabhi rachanaye ek se badhakar ek.



भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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