मोर पपिहा खेजडी, करता रहा तलाश ।
धीरे धीरे मिट गया, बादल एक आकाश।।
.
टपटप टपके टापरा, पिया गये परडेर ।
बरखा से काली पडी, नजर कूप मुण्डेर।।
.
पूरनमासी शरद की, अमी पयस बरसात ।
अंक यामिनी गुलमुहर, झुलसा सारी रात।।
.
असली सूरत लापता, मुह खोटे अनगीन।
जैसा ओसर सामने, मुखडे पर धर लीन।।
.
हेम रजत झंकार नित, गूंजे जाके कान।
गाली सी वाको लगे, आरती अरु अजान।।
.
अंधियारा मावस भरा, रोशन बिन्दु प्रहार।
अभिकर्ता जुगनू हुए , चंदा करे व्यापार।
,
विनय के जोशी
शनिवार, 25 अक्टूबर 2008
रविवार, 12 अक्टूबर 2008
क्षणिकाएं
(१)
जल
छू सकता
महसूस कर सकता
छाया को
लेकिन, अपने साथ
बहा नही सकता
(२)
छाया
लिपट सकती
चूम सकती
जल से
लेकिन, उसमें
नहा नही सकती
(३)
पेड़
अचल तन मन
मनस्वी
नदी छाया के
खेल से अविचलित
तपस्वी
(४)
नदी
पहाड़ से बिछडती
विलाप करती
कितनी शांत जब
सागर से
मिलाप करती
(५)
पहाड़
उर की आग
मन का गुबार
घुटन का उभार
(६)
बादल
रुई के
उड़ते फोहे नम
पहाड़ के
जख्मों पर
लगाते मरहम
(७)
फूल
अम्बर को
स्वीकार
माटी का
आभार
.
विनय के जोशी
जल
छू सकता
महसूस कर सकता
छाया को
लेकिन, अपने साथ
बहा नही सकता
(२)
छाया
लिपट सकती
चूम सकती
जल से
लेकिन, उसमें
नहा नही सकती
(३)
पेड़
अचल तन मन
मनस्वी
नदी छाया के
खेल से अविचलित
तपस्वी
(४)
नदी
पहाड़ से बिछडती
विलाप करती
कितनी शांत जब
सागर से
मिलाप करती
(५)
पहाड़
उर की आग
मन का गुबार
घुटन का उभार
(६)
बादल
रुई के
उड़ते फोहे नम
पहाड़ के
जख्मों पर
लगाते मरहम
(७)
फूल
अम्बर को
स्वीकार
माटी का
आभार
.
विनय के जोशी
मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008
रंग
लाल हरे
नीले पीले
एक दूजे से मिल
फिर-फिर,
नये-नये
रंग बनाते रंग,
रंग बिरंगे रंग
बिखेर दिए तुमने
हर टहनी पर
हवा संग लहराती टहनियाँ ,
आसमान में रंग भरती टहनियाँ
गगन में अगन और
बदन में बरखा के अभी
कुछ ही रंग भरे थे कि
तुम चल दिए लाम पर
कलेवा और कसमें
दी थी राह के लिए,
तुम तो रंग भी समेट ले गए
लेकर गए हजारों,
लौटे केवल तीन लेकर
नयन नीर का तर्पण देकर
इन्द्रचाप से मुख मोड़ लिया
तस्वीर तुम्हारी सजा केसरिया
दर्पण से नाता तोड़ लिया
बीज सहेजा था जो उर में
हरा उससे जोड़ लिया
सौगात तुम्हारी सर माथे
रंग सफेद ख़ुद ओढ़ लिया
.
विनय के जोशी
नीले पीले
एक दूजे से मिल
फिर-फिर,
नये-नये
रंग बनाते रंग,
रंग बिरंगे रंग
बिखेर दिए तुमने
हर टहनी पर
हवा संग लहराती टहनियाँ ,
आसमान में रंग भरती टहनियाँ
गगन में अगन और
बदन में बरखा के अभी
कुछ ही रंग भरे थे कि
तुम चल दिए लाम पर
कलेवा और कसमें
दी थी राह के लिए,
तुम तो रंग भी समेट ले गए
लेकर गए हजारों,
लौटे केवल तीन लेकर
नयन नीर का तर्पण देकर
इन्द्रचाप से मुख मोड़ लिया
तस्वीर तुम्हारी सजा केसरिया
दर्पण से नाता तोड़ लिया
बीज सहेजा था जो उर में
हरा उससे जोड़ लिया
सौगात तुम्हारी सर माथे
रंग सफेद ख़ुद ओढ़ लिया
.
विनय के जोशी
सोमवार, 6 अक्टूबर 2008
घुटन
थम जाते है
कदम मेरे लिए
चेतना का हर पल
मुझे समर्पित है
हर आह
हर सिसकी पर
रहता है मेरा नाम
लेकिन हर एक को
अपने से अलग
करने की कोशिश में पाता हूँ
मै
जिस्म में चुभा कांटा हूँ
चीखो
चिल्लाओ
कोहराम मचा दो
पर मुझे तो ना कोसो
अरे !
तुम्हे तो फकत
मेरी चुभन का ही दर्द है
मेरा तो
दम घुटा जा रहा है
तुम्हारे जिस्म में
.
विनय क जोशी
कदम मेरे लिए
चेतना का हर पल
मुझे समर्पित है
हर आह
हर सिसकी पर
रहता है मेरा नाम
लेकिन हर एक को
अपने से अलग
करने की कोशिश में पाता हूँ
मै
जिस्म में चुभा कांटा हूँ
चीखो
चिल्लाओ
कोहराम मचा दो
पर मुझे तो ना कोसो
अरे !
तुम्हे तो फकत
मेरी चुभन का ही दर्द है
मेरा तो
दम घुटा जा रहा है
तुम्हारे जिस्म में
.
विनय क जोशी
रविवार, 5 अक्टूबर 2008
बुधवार, 1 अक्टूबर 2008
शहर के पेड़
अट्टालिकाओं
निर्मित कुआँ
खासंते वाहन
उगलते धुआं
सुलगती चिमनियाँ
जहरीले आगार
जबरन तन नौचते
विद्युत भुजंग तार
ज्ञापन विज्ञापन
छाती में कीले
दिल खुरचे
नाम छीले
छिकती खिड़कियाँ
बेसुध वातायन
उतावले राहगीर
घृणित सिंचन
फ़िर भी
जिन्दा है
सब कुछ सहते
सभ्यों की
असभ्यता
उर में धरते
क्यूँ कि,
पेड़ आत्महत्या
नही करते
.
विनय के जोशी
निर्मित कुआँ
खासंते वाहन
उगलते धुआं
सुलगती चिमनियाँ
जहरीले आगार
जबरन तन नौचते
विद्युत भुजंग तार
ज्ञापन विज्ञापन
छाती में कीले
दिल खुरचे
नाम छीले
छिकती खिड़कियाँ
बेसुध वातायन
उतावले राहगीर
घृणित सिंचन
फ़िर भी
जिन्दा है
सब कुछ सहते
सभ्यों की
असभ्यता
उर में धरते
क्यूँ कि,
पेड़ आत्महत्या
नही करते
.
विनय के जोशी
शनिवार, 27 सितंबर 2008
मिनी के होस्टल जाने पर
मैं
रो नहीं रहा
यह तो कुछ अन्यायी
पलों की किरचें है
जो पलकों के किनारे
चुभ गई है
बस उन्हे निकालने को
आँखों से पानी
बह चला हैं
तुम्हारा भाई मुक्त उन्मुक्त
पर तुम्हे खिड़की से झांकना भी मना
तुम्हारे कपडों का
जाँच और बहस के बाद
तय किया जाना
मैं बाजार से आता
तुम सहमी पढ़ती होती
भाई कम्प्यूटर पर
मोबाईल
दोस्त
अंतरजाल
तुम्हें वार्जित ,
वर्जित तुम्हारा ऊँचा बोलना
तेज आवाज मे गाना
आरोपों का उत्तर देना
ओह !
फ़िर सब कुछ धुंधला हो गया
मैं रो थोड़े ही रहा हूँ
मुझे रोने की
फुर्सत भी नही है
रोना मेरे लिए विलासिता है
अभी तो हर पल
मेरे अहसास को
तुम्हारे साथ रखना है
जो तुम्हे बेटी होने की
याद दिलाता रहे
मैं रो नही रहा
यह तो कुछ
अन्यायी पलों की किरचे है
जो पलकों के किनारे खरोंच जाती है
रंगहीन लहु नजरों के साहिल से
छलक जाता है
मैं रो नही रहा ........
रोऊंगा तो तब
जब तुम
ससुराल चली जाओगी
क्योंकिं
तब मैं तुम्हारी चौकसी
किसी और को सौंप
बेरोजगार हो जाऊंगा
.
विनय के जोशी
रो नहीं रहा
यह तो कुछ अन्यायी
पलों की किरचें है
जो पलकों के किनारे
चुभ गई है
बस उन्हे निकालने को
आँखों से पानी
बह चला हैं
तुम्हारा भाई मुक्त उन्मुक्त
पर तुम्हे खिड़की से झांकना भी मना
तुम्हारे कपडों का
जाँच और बहस के बाद
तय किया जाना
मैं बाजार से आता
तुम सहमी पढ़ती होती
भाई कम्प्यूटर पर
मोबाईल
दोस्त
अंतरजाल
तुम्हें वार्जित ,
वर्जित तुम्हारा ऊँचा बोलना
तेज आवाज मे गाना
आरोपों का उत्तर देना
ओह !
फ़िर सब कुछ धुंधला हो गया
मैं रो थोड़े ही रहा हूँ
मुझे रोने की
फुर्सत भी नही है
रोना मेरे लिए विलासिता है
अभी तो हर पल
मेरे अहसास को
तुम्हारे साथ रखना है
जो तुम्हे बेटी होने की
याद दिलाता रहे
मैं रो नही रहा
यह तो कुछ
अन्यायी पलों की किरचे है
जो पलकों के किनारे खरोंच जाती है
रंगहीन लहु नजरों के साहिल से
छलक जाता है
मैं रो नही रहा ........
रोऊंगा तो तब
जब तुम
ससुराल चली जाओगी
क्योंकिं
तब मैं तुम्हारी चौकसी
किसी और को सौंप
बेरोजगार हो जाऊंगा
.
विनय के जोशी
गुरुवार, 25 सितंबर 2008
मैं
दर्पण में दिखता
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया
मुझ से
परे "मैं" पा गया
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया
मुझ से
परे "मैं" पा गया
रविवार, 21 सितंबर 2008
यादें
किरणों के
पांखी तो
दिन
माह
बरस को
यादों में बदल
उड़ जाते है,
रह जाते है हम
सुनसान द्वीप में
धधकते ज्वालामुखी की तरह
बूंद बूंद झुलसते सपने
राख राख उछलते लम्हे
जलते
पिघलते
उबलते
तह दर तह
जमा होते अहसास
पर्वत के अश्रु
पत्थर होने से लेकर
सूरज के कदमों तले
रौंदे जाने तक
संज्ञाशून्य बने रहना है
या........
दर्द का ज्वालामुखी
सीने में दफ़न किए
एक दिन ख़ुद ही
दफ़न हो जाना है |
.
विनय के जोशी
पांखी तो
दिन
माह
बरस को
यादों में बदल
उड़ जाते है,
रह जाते है हम
सुनसान द्वीप में
धधकते ज्वालामुखी की तरह
बूंद बूंद झुलसते सपने
राख राख उछलते लम्हे
जलते
पिघलते
उबलते
तह दर तह
जमा होते अहसास
पर्वत के अश्रु
पत्थर होने से लेकर
सूरज के कदमों तले
रौंदे जाने तक
संज्ञाशून्य बने रहना है
या........
दर्द का ज्वालामुखी
सीने में दफ़न किए
एक दिन ख़ुद ही
दफ़न हो जाना है |
.
विनय के जोशी
मंगलवार, 16 सितंबर 2008
मुक्तक
सच्ची
फ़तह वही
जो खुशी दे
हासिल से
चूक तक
सच्चा
कवित्त वही
जिसे पढ
हिल जाये
वाचाल से
मूक तक
> विनय के जोशी
फ़तह वही
जो खुशी दे
हासिल से
चूक तक
सच्चा
कवित्त वही
जिसे पढ
हिल जाये
वाचाल से
मूक तक
> विनय के जोशी
रविवार, 14 सितंबर 2008
प्रेत
मैं प्रेत को नही जानता
मैं प्रेत को मानता भी नही
परवश होना मेरे लिए
कल्पना की बात है
नियंत्रण की डोर ख़ुद
अपने ही हाथ है
लेकिन यह मान महल
अब कोई कुरेद रहा है
कोई कठफोड़वा प्रेत
विश्वास दरख्त छेद रहा है
जटिल से सहज विकास पथ है
शाश्वत यात्रा विकास रथ है
बात उलझाकर सुलझाना
मेरी फितरत है
पेशे से अध्यापक हूँ
पढाना मेरी किस्मत है
बात अधिक ना उलझाकर
सहज शब्दों में बताता हूँ
कई वर्ष पहले मेरी कक्षा में
दो छात्र थे, यूँ तो कई थे पर
दो विशेष याद है
एक मेधावी दूसरा फिसड्डी
एक शर्ट पेंट पहनता
दूसरा बनियान चड्डी
पहले को पढाने में, मैं करता
अपनी सम्पूर्ण उर्जा समर्पित
दूसरा रहा सदा उपेक्षित
मैं कहता पढ़ना
नही काम तेरा
चपरासी सा काम
करता वो मेरा
पहला दिनों दिन प्रखर होता चला गया
दूसरा आख़िर पढ़ाई छोड़ चला गया
पर ना छोड़ी विनम्रता
सदा करता मेरा सम्मान
जहाँ भी मिलता झुकता
कहता गुरूजी प्रणाम
नियति की माया अनोखी
धूप हँसे और शबनम रोती
बरसों में जो माला पिरोती
एक पल में बिखरे मोती
अब बात को अंजाम तक लाता हूँ
अपनी जिन्दा मौत की दास्ताँ सुनाता हूँ
पहले शिष्य ने परदेश को
देश कबूला हैं
मेरा क्या अपने गाँव का
नाम तक भूला है
एक बार आया
मैं मिलने गया
हाथ में सिगरेट
मुंह फेर लिया
मैं फ़िर फ़िर
जाता रहा उसके पास
मन में लिए यह आस
मुझे पहचाने स्वीकारे
बचपन की शिक्षा का
एहसान माने
वह बेशर्म हर बार
नजरे चुराता रहा
मेरे दिल पर बार बार
हथौडा सा लगा
दूसरा गावं से स्टेशन तक
रिक्शा चलता है
मुझे पैदल चलते देख
आदर से बिठाता है
हर बरस मेरे घर
नारियल रौली पुष्प ले आता है
श्रद्धा से नमन करता
आचमन कराने को
चरण धुलता है
आज फ़िर शिक्षक दिवस है
और वह मेरे घर आया है
रौली का वह टीका देगा
श्रीफल भेंट करेगा वो
कांधे पर माला लादेगा
चरणों में शीश धरेगा वो
मैं पिघलता अन्दर से
घबराता इस मंजर से
चाहता हूँ नमन करना
चाहता उसे गले लगाना, पर
जकड लेता मुझे कोई
पकड़ लेता मुझे कोई
पराधीन मेरी काया है
क्या करूँ ...... ?
एक पुराने अध्यापक के
प्रेत का मुझ पर साया है
.
विनय के जोशी
मैं प्रेत को मानता भी नही
परवश होना मेरे लिए
कल्पना की बात है
नियंत्रण की डोर ख़ुद
अपने ही हाथ है
लेकिन यह मान महल
अब कोई कुरेद रहा है
कोई कठफोड़वा प्रेत
विश्वास दरख्त छेद रहा है
जटिल से सहज विकास पथ है
शाश्वत यात्रा विकास रथ है
बात उलझाकर सुलझाना
मेरी फितरत है
पेशे से अध्यापक हूँ
पढाना मेरी किस्मत है
बात अधिक ना उलझाकर
सहज शब्दों में बताता हूँ
कई वर्ष पहले मेरी कक्षा में
दो छात्र थे, यूँ तो कई थे पर
दो विशेष याद है
एक मेधावी दूसरा फिसड्डी
एक शर्ट पेंट पहनता
दूसरा बनियान चड्डी
पहले को पढाने में, मैं करता
अपनी सम्पूर्ण उर्जा समर्पित
दूसरा रहा सदा उपेक्षित
मैं कहता पढ़ना
नही काम तेरा
चपरासी सा काम
करता वो मेरा
पहला दिनों दिन प्रखर होता चला गया
दूसरा आख़िर पढ़ाई छोड़ चला गया
पर ना छोड़ी विनम्रता
सदा करता मेरा सम्मान
जहाँ भी मिलता झुकता
कहता गुरूजी प्रणाम
नियति की माया अनोखी
धूप हँसे और शबनम रोती
बरसों में जो माला पिरोती
एक पल में बिखरे मोती
अब बात को अंजाम तक लाता हूँ
अपनी जिन्दा मौत की दास्ताँ सुनाता हूँ
पहले शिष्य ने परदेश को
देश कबूला हैं
मेरा क्या अपने गाँव का
नाम तक भूला है
एक बार आया
मैं मिलने गया
हाथ में सिगरेट
मुंह फेर लिया
मैं फ़िर फ़िर
जाता रहा उसके पास
मन में लिए यह आस
मुझे पहचाने स्वीकारे
बचपन की शिक्षा का
एहसान माने
वह बेशर्म हर बार
नजरे चुराता रहा
मेरे दिल पर बार बार
हथौडा सा लगा
दूसरा गावं से स्टेशन तक
रिक्शा चलता है
मुझे पैदल चलते देख
आदर से बिठाता है
हर बरस मेरे घर
नारियल रौली पुष्प ले आता है
श्रद्धा से नमन करता
आचमन कराने को
चरण धुलता है
आज फ़िर शिक्षक दिवस है
और वह मेरे घर आया है
रौली का वह टीका देगा
श्रीफल भेंट करेगा वो
कांधे पर माला लादेगा
चरणों में शीश धरेगा वो
मैं पिघलता अन्दर से
घबराता इस मंजर से
चाहता हूँ नमन करना
चाहता उसे गले लगाना, पर
जकड लेता मुझे कोई
पकड़ लेता मुझे कोई
पराधीन मेरी काया है
क्या करूँ ...... ?
एक पुराने अध्यापक के
प्रेत का मुझ पर साया है
.
विनय के जोशी
मंगलवार, 9 सितंबर 2008
एक और दिन उगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
लो फिर शुरु हुआ
झुठ कहने और
सुनने का सिलसिला
मन एकाकी औरा ओढे
जन अरण्य मे
भटकने का सिलसिला
विवेक ह्र्दय सत्य सोया
बस स्वार्थ है जगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
लो फिर शुरु हुआ
झुठ कहने और
सुनने का सिलसिला
मन एकाकी औरा ओढे
जन अरण्य मे
भटकने का सिलसिला
विवेक ह्र्दय सत्य सोया
बस स्वार्थ है जगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
शनिवार, 6 सितंबर 2008
भूकंप
भूकंप
जो पिछले दिनों
आया था शहर में
कुछ ज्यादा ही
जोर से था
मैं तो जलजले की
अभ्यस्त थी पर
मकान में दरारे आ गई
कुछ दिनों बाद
एक कारीगर बुलाया
और मरम्मत करवा दी
जाते-जाते उसने कहा .....
दरारों मे भरी सीमेंट की
तराई करना |
पानी की धार को
सीमेंट ने
एकदम सोंख लिया
मुझे अपने
शहीद बेटे का
पहला दूध पीना
याद आ गया |
फिर तराई के लिए
पानी की जरुरत न रही |
.vinay k joshi
जो पिछले दिनों
आया था शहर में
कुछ ज्यादा ही
जोर से था
मैं तो जलजले की
अभ्यस्त थी पर
मकान में दरारे आ गई
कुछ दिनों बाद
एक कारीगर बुलाया
और मरम्मत करवा दी
जाते-जाते उसने कहा .....
दरारों मे भरी सीमेंट की
तराई करना |
पानी की धार को
सीमेंट ने
एकदम सोंख लिया
मुझे अपने
शहीद बेटे का
पहला दूध पीना
याद आ गया |
फिर तराई के लिए
पानी की जरुरत न रही |
.vinay k joshi
बुधवार, 27 अगस्त 2008
उस पार
मार्ग अंधेरा हो गया, अभी तो है मंझधार
नैय्या फसी तूफान में, खेवय्या उस पार
रोज निहारे रूप को, इतराये हर बार
बिन श्रृंगार सीरत रही, कदरदान उस पार
मन का विहग कब का उड़ा तन तन्हा लाचार
तैरना ना जानू मैं सखी, सजन खडे उस पार
हाथ बढा हक छीन ले, सच्चाई हथियार
क्यूं लाचारी ऒढ तू, आस तके उस पार
भक्ति शक्ति शतगुनी, बिन पूंजी व्यापार
जितनी चाहे निपज लो, खरीददार उस पार
तिनके तिनके जमा किये, ले न सके आकार
नव सृजन फिर शुरू करे, आऒ चले उस पार
नैय्या फसी तूफान में, खेवय्या उस पार
रोज निहारे रूप को, इतराये हर बार
बिन श्रृंगार सीरत रही, कदरदान उस पार
मन का विहग कब का उड़ा तन तन्हा लाचार
तैरना ना जानू मैं सखी, सजन खडे उस पार
हाथ बढा हक छीन ले, सच्चाई हथियार
क्यूं लाचारी ऒढ तू, आस तके उस पार
भक्ति शक्ति शतगुनी, बिन पूंजी व्यापार
जितनी चाहे निपज लो, खरीददार उस पार
तिनके तिनके जमा किये, ले न सके आकार
नव सृजन फिर शुरू करे, आऒ चले उस पार
मंगलवार, 26 अगस्त 2008
कामचोर
हृदय कुछ
कमजोर हो गया है ।
पूरी क्षमता से
काम नही करता,
शायद कामचोर हो गया है ।
किडनी भी
ठीक नही रहती,
डॉक्टर की निग़ाह पर है ।
औरत मर्द एक से दिखते,
बच्चे बन्दर गढ लेती है ।
थक सी गई है आँखे,
कुछ का कुछ पढ लेती है ।
इतने कामचोरों संग रह कर,
आत्मावलोकन कर लेता हूँ ।
पछतावे से हर पल बोझल,
अपनी नज़रे भर लेता हूँ ।
मुझे याद आते वह पल,
जब हम केंटीन में सोते थे ।
घंटों खिड़की पर लाईन लगा कर,
लोग किस्मत को रोते थे ।
काम करता मेरे हिस्से का,
लम्हा-लम्हा छीजता था ।
जाने कौन स्वेद कणों से
मेरी तनख़ा सींचता था ।
कमजोर हो गया है ।
पूरी क्षमता से
काम नही करता,
शायद कामचोर हो गया है ।
किडनी भी
ठीक नही रहती,
डॉक्टर की निग़ाह पर है ।
औरत मर्द एक से दिखते,
बच्चे बन्दर गढ लेती है ।
थक सी गई है आँखे,
कुछ का कुछ पढ लेती है ।
इतने कामचोरों संग रह कर,
आत्मावलोकन कर लेता हूँ ।
पछतावे से हर पल बोझल,
अपनी नज़रे भर लेता हूँ ।
मुझे याद आते वह पल,
जब हम केंटीन में सोते थे ।
घंटों खिड़की पर लाईन लगा कर,
लोग किस्मत को रोते थे ।
काम करता मेरे हिस्से का,
लम्हा-लम्हा छीजता था ।
जाने कौन स्वेद कणों से
मेरी तनख़ा सींचता था ।
रविवार, 24 अगस्त 2008
सरल बात
सतत प्रयासरत रहते जो
मनुज सदा सराहे जाते
छोटे छोटे कदमो से ही
पर्वत पार कर वो जाते
बूंद बूंद से बादल बन
सम्पूर्ण धरा पर छा जाते
छोटे छोटे लक्ष्यों से ही
लक्ष्य बड़ा सहज पा जाते
.
मुस्कराहट विजय आहट
लघुता से विस्तार पाते
जितना झुके उतना उठे
आदर दे आदर है पाते
कमी खोजते अपने भीतर
बाहर भूरी प्रशंसा पाते
अच्छाई अनुगूँज अनोखी
दिग् दिगन्त द्विगुणित पाते
मनुज सदा सराहे जाते
छोटे छोटे कदमो से ही
पर्वत पार कर वो जाते
बूंद बूंद से बादल बन
सम्पूर्ण धरा पर छा जाते
छोटे छोटे लक्ष्यों से ही
लक्ष्य बड़ा सहज पा जाते
.
मुस्कराहट विजय आहट
लघुता से विस्तार पाते
जितना झुके उतना उठे
आदर दे आदर है पाते
कमी खोजते अपने भीतर
बाहर भूरी प्रशंसा पाते
अच्छाई अनुगूँज अनोखी
दिग् दिगन्त द्विगुणित पाते
शनिवार, 23 अगस्त 2008
एक और दिन उगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
लो फिर शुरु हुआ
झुठ कहने और
सुनने का सिलसिला
मन एकाकी औरा ओढे
जन अरण्य मे
भटकने का सिलसिला
विवेक, ह्र्दय, सत्य सोया
बस स्वार्थ है जगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
लो फिर शुरु हुआ
झुठ कहने और
सुनने का सिलसिला
मन एकाकी औरा ओढे
जन अरण्य मे
भटकने का सिलसिला
विवेक, ह्र्दय, सत्य सोया
बस स्वार्थ है जगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
मंगलवार, 19 अगस्त 2008
शुक्रवार, 15 अगस्त 2008
आगे बढ़ता देश हमारा
एक जर्जरित फ्रॉक में
दूसरा उघाड़े बदन
चमड़ी पर मेल की पपड़ियाँ
कूल्हे पर फटी निक्कर
गटर की अविरल धारा
कभी बोतल मिल जाती
कभी मिल जाता
पेप्सी का खाली टिन
दौड़ कर किनारे
बोरी के खजाने में
जमा कर आते
खुश हो जाते
दुगुने उत्साह से
फिर लग जाते
नज़र पड़ी
बहते आधे खाए सेव पर
हाथ से पोंछा
कुछ ख़ुद खाया
कुछ उसे दिया
खाली पेट में कुछ गया
तभी हाथ में पकड़ी
लकड़ी से अटक गया
रंग-बिरंगा एक कपड़ा
डंडा बन गया झंडा
करते कीचड़ में धमाल
अबोध भाई-बहन
संवेद स्वर में गाते रहे
झंडा ऊँचा रहे हमारा
आगे बढ़ता देश हमारा
दूसरा उघाड़े बदन
चमड़ी पर मेल की पपड़ियाँ
कूल्हे पर फटी निक्कर
गटर की अविरल धारा
कभी बोतल मिल जाती
कभी मिल जाता
पेप्सी का खाली टिन
दौड़ कर किनारे
बोरी के खजाने में
जमा कर आते
खुश हो जाते
दुगुने उत्साह से
फिर लग जाते
नज़र पड़ी
बहते आधे खाए सेव पर
हाथ से पोंछा
कुछ ख़ुद खाया
कुछ उसे दिया
खाली पेट में कुछ गया
तभी हाथ में पकड़ी
लकड़ी से अटक गया
रंग-बिरंगा एक कपड़ा
डंडा बन गया झंडा
करते कीचड़ में धमाल
अबोध भाई-बहन
संवेद स्वर में गाते रहे
झंडा ऊँचा रहे हमारा
आगे बढ़ता देश हमारा
सोमवार, 11 अगस्त 2008
अजाना गाँव
पलक झपकी
बीत गये
जाने कितने बसन्त
व्यतित होंगे
और कितने
आ जायेगा अन्त
मील के पत्थर
त्वरित आते
गुजर जाते
वर्तमान की झोली
खाली ही पाते
केश मन को
स्याह कर
जाने कब
धवल हो गये
शीशे की दीवारों में
कैद चक्षु कमल
हो गये
चिकने गाल मैदान
नालियों में
ढल गये
स्वार्थ रंजित
मीठे बोल
गालियों में
बदल गये
लाचारी अधर धर
दंत पंक्ति खो गई
तीर सी सधी काया
ढीला धनुष हो गई
मोह का सहरा
रेणु धंसते
पांव है
ना जाने अब दूर कितना
अबुझ अजाना
गांव है
बीत गये
जाने कितने बसन्त
व्यतित होंगे
और कितने
आ जायेगा अन्त
मील के पत्थर
त्वरित आते
गुजर जाते
वर्तमान की झोली
खाली ही पाते
केश मन को
स्याह कर
जाने कब
धवल हो गये
शीशे की दीवारों में
कैद चक्षु कमल
हो गये
चिकने गाल मैदान
नालियों में
ढल गये
स्वार्थ रंजित
मीठे बोल
गालियों में
बदल गये
लाचारी अधर धर
दंत पंक्ति खो गई
तीर सी सधी काया
ढीला धनुष हो गई
मोह का सहरा
रेणु धंसते
पांव है
ना जाने अब दूर कितना
अबुझ अजाना
गांव है
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