मैं कुछ लिखना चाहता हूँ,
जिसे पढ़ते ही नजरे थूक दे
पाठक निम्बोली बन जाये,
रोम रोम जिस्म में घुसता कड़वापन
अब बर्दास्त नहीं होता
अंतस की निर्वासित मिठास लापता है
हर रोज जगती थी
आत्मह्त्या के सपनों के साथ
सुना है सुबह के सपने सच होते है
और अब बंगलादेशी घुसपेठियों की तरह
पसरती कड़वाहट का
जिस्म के मुल्क पर आधिपत्य है
आस्था से व्यवस्था तक
कड़वाहट की एक मोटी परत जम चुकी है
लेकिन अब जगह नहीं बची जिस्म में
निगाहों में समाती है तो
जुबा से निकल पड़ती है
निगाहें और जुबा बंद करनी पड़ती है तो
कागज़ पर छलक जाती है
कड़वाहट की खरपतवार अब
मुख्य फसल हो गयी है
मेरे अन्दर का ढोर इसे चर चर के
बहुत मोटा ताज़ा हो गया है
इतना सब होने पर भी
आशा की एक किरण बाकी है
जैसे बुजुर्ग डायरी में 'राम राम' लिखते है
मेरी भी 'मीठा मीठा' लिखने की इच्छा होती है
*
विनय के जोशी
गुरुवार, 4 नवंबर 2010
रविवार, 19 सितंबर 2010
माँ

जब धूप पसर जाती
रसोईघर के बाहर
मैं वहां बैठ
अ से अम्मा
लिखा करता
माँ धुएँ के कोहरे में
गुनगुनाती
आटा गूंथती
रोटियां बेलती
और साथ ही बनाती
आटे की छोटी-छोटी गोलियां
फिर उन्हें
आँगन में फैला देती
एक-दो-तीन
कई चिडियां आती
चहचहाती
गोलियां चुगती
सजीव हो जाते
बेलन, कलछी, चिमटा
अग्नि नृत्य करती
चूल्हे की मुंडेर पर
रसोईघर जलसाघर हो जाता
.
अब न घर में माँ हैं
न शहर में चिडियां
बस केवल
आटे की गोलियां बची है
जब कभी तन्हा होता हूँ
कुछ गोलियां बिखेर देता हूँ
और माँ
चिडियां बन
मन के आँगन में
उतर आती है
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
लफ़्जों के तस्कर आबाद यहां
सीता अब लकीर नहीं रखती
द्रोपदी भी चीर नहीं रखती
.
रंभा, मेनका, उर्वशी तो है
जन्नते हुस्न हीर नहीं रखती
.
दौलत ऐ खुदगर्जी हो तो दस्तक दें
राजनीति फ़कीर नहीं रखती
.
लफ़्जों के तस्कर आबाद यहां
यह गली अब मीर नहीं रखती
.
जेरो-जबर ना काफ़िया पेमा
विशेष कलम जंजीर नहीं रखती
.
द्रोपदी भी चीर नहीं रखती
.
रंभा, मेनका, उर्वशी तो है
जन्नते हुस्न हीर नहीं रखती
.
दौलत ऐ खुदगर्जी हो तो दस्तक दें
राजनीति फ़कीर नहीं रखती
.
लफ़्जों के तस्कर आबाद यहां
यह गली अब मीर नहीं रखती
.
जेरो-जबर ना काफ़िया पेमा
विशेष कलम जंजीर नहीं रखती
.
शुक्रवार, 4 जून 2010
यादें / फना होते बादल

यादें / फना होते बादल
*
मैं दिन में
सपने देखता था,
क्यूँ कि ,
जलाना होता था उन्हें,
रातों को रोशन करने के लिए |
गर रातें रोशन न होती तो,
कैसे पढ़ पाती मेरी उंगलियाँ वे इबारतें ,
जो तुम्हारी आँखों ने,
मेरी पीठ पर लिखी थी |
कैसे देखा पाता वह सोंधी महक,
जो तुम आँगन के नीम पर
टांग कर चली गई थी |
इतना ही नही,
रात भर जो डाकियाँ,
दौड़ता रहता था धड़कनों की चिट्ठियां बांटने,
उसे भी तो हांशियें पर उग आये
काँटों से बचाना होता था |
सिसकियाँ रेंगती थी हलक से पलक तक ,
उन्हें टूटे अधरों की
किरचों से बचाना था |
काल के कारखाने के,
सभी कल पुर्जे ठीक ही काम कर रहे थे
लेकिन ,
उम्र के हिमनद क्या करे जो
चुपचाप पसरता चला गया और,
मन की सरकार ने
यादों की खेती
अवैध घोषित कर दी
बस ! मैंने भी
बंद कर दिया ,
दिन में सपने देखना
अब मैं,
रातों को सपने देखता हूँ
और दिन में गमछे सा
कंधे पर टांक देता हूँ,
पसीना पोंछने के लिए |
*
विनय के जोशी
रविवार, 2 मई 2010
अजन्मी
अजन्मी
*
जर्जर काया
पराश्रित जीवन
बुढ़ापा भारी
उस पर नारी....
मैं कौन ?
मेरी ख्वाहिशें क्या ?
अधेड़ प्रौढ़ा
कुल की माया
नाती-पोतों की आया
उपेक्षा के बदले
वारी वारी ........
लहलहाती फसल
खनकता कुन्दन
शृंगारित दासी
जर जमीन जोरू
जागीरदारी ........
आदमखोर स्वछंद
मासूम कैद
संभल कर चलो
ओ नारी !
अभी हो कुंवारी ....
दूध भैया का .....
खिलौने भैया के ......
स्कूल भैया जाएगा ..........
उफ !
बहुत बुरा है,
दो पैरों का जानवर
अपनी मादा के साथ |
शुक्र है मैं मुक्त हूँ
उन्मुक्त हूँ
जीवन रहा नही
मरण वार दिया
तन तरिणी
वन्ही (अग्नि) सागर
पल में पार किया ...
सांसें लेती
लाशों ने मुझे
कोख ही मे मार दिया
*
vinay k joshi
*
जर्जर काया
पराश्रित जीवन
बुढ़ापा भारी
उस पर नारी....
मैं कौन ?
मेरी ख्वाहिशें क्या ?
अधेड़ प्रौढ़ा
कुल की माया
नाती-पोतों की आया
उपेक्षा के बदले
वारी वारी ........
लहलहाती फसल
खनकता कुन्दन
शृंगारित दासी
जर जमीन जोरू
जागीरदारी ........
आदमखोर स्वछंद
मासूम कैद
संभल कर चलो
ओ नारी !
अभी हो कुंवारी ....
दूध भैया का .....
खिलौने भैया के ......
स्कूल भैया जाएगा ..........
उफ !
बहुत बुरा है,
दो पैरों का जानवर
अपनी मादा के साथ |
शुक्र है मैं मुक्त हूँ
उन्मुक्त हूँ
जीवन रहा नही
मरण वार दिया
तन तरिणी
वन्ही (अग्नि) सागर
पल में पार किया ...
सांसें लेती
लाशों ने मुझे
कोख ही मे मार दिया
*
vinay k joshi
नमो चक्रधर
नमो चक्रधर
*
हिमालय से
सरके
हिमप्रस्तर
मौन मानुष
हिमनद
पिघल कर
सतत प्रवाही
माँ हो गए
तह अंगीकार विकार
सतह अमृत सिंचन
जलधि हिय समा
हवा की पालकी संग
कण कण तुषार
फिर हिमालय हो गए
सर्वत्र
यही परिलक्षित
अणु से आकाशगंगा
अनंत
अनिवारित चक्राधीन
*
विनय के जोशी
*
हिमालय से
सरके
हिमप्रस्तर
मौन मानुष
हिमनद
पिघल कर
सतत प्रवाही
माँ हो गए
तह अंगीकार विकार
सतह अमृत सिंचन
जलधि हिय समा
हवा की पालकी संग
कण कण तुषार
फिर हिमालय हो गए
सर्वत्र
यही परिलक्षित
अणु से आकाशगंगा
अनंत
अनिवारित चक्राधीन
*
विनय के जोशी
बुधवार, 24 फ़रवरी 2010
तड़ित

आज की जिंदगी
इस कदर टुकड़ों में बंट गई है
कि इंसान की मौत मैं भी,
पूर्णता नहीं रह गई है.
हजारो में से कोई एक
सम्पूर्ण मौत मरता होगा
और मरने के बाद खुद भी,
अपनी मौत पर गर्व करता होगा .
अरे ! आज कल एक साथ
पूरी मौत होती ही कंहा है ?
टुकडे टुकडे मौत की
किरचे समेटती
लहुलुहान रूह को
पता ही नहीं चलता
कब मासूमियत की मौत हुई
कब अच्छाई, इमानदारी
पवित्रता और खुद्दारी कल बसी,
कब चल बसा,
बचपन का भोलापन,
यौवन का उत्साह
झूठ बोलते है सब,
हर एक को पता है ,
कंहा और कब कितनी मोते हुई,
कब चाँदी के टुकड़ो खातिर मरा
कब जिंदगी बिगाड़ी, ज़िन्दगी बनाने खातिर
मानव गोस्त और सत्ता वेश्या के लिए तो
कदम कदम पर ख़ुदकुशी होती रही,
दोष किसका ?
बचपन में, सो जा - नहीं तो शेर आ जाएगा से,
खंडित विश्वास को
कई हमसफ़र मिलते चले गए और
इस देह मंदिर से मूल्य रिसते चले गए.
जब आस्था और विश्वास ही
मुर्दा हो तो,
इंसान ज़िंदा नहीं होता,
जिस्मों में आत्म उद्वेलित
तड़ित न हो तो,
स्पंदन पैदा नहीं होता
लाशो के समागम से
जीवन पैदा नहीं होता
*
विनय के जोशी
बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
1411
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
दिनकर कभी अस्त नहीं होता

मौज का महल ध्वस्त नहीं होता
नूरे मुन्तजिर पस्त नहीं होता
शब् धरती की अपनी करनी है
दिनकर कभी अस्त नहीं होता
ज़ुल्म कही भी हो व्यथित होता है
सुखनवर कभी व्यस्त नहीं होता
झुकता रहा सज़दे में हरबार मगर
कही सर तो कही दस्त नहीं होता
फकीरी नहीं होती हमसफ़र जिसकी
शाह होता है मगर मस्त नहीं होता
बेतरतीब अश'आर पेश है, हर कोई
वियाकरण का अभ्यस्त नहीं होता
लती मतलबी

ईश्वर को
ऊँगली दिखाता
व्योम छिद्रान्वेषी
टावर,
प्रतिपल बताता
मौसम की जानकारी
चाँद पर पानी के सबूत
भूकंप,
सूनामी,
बवंडर के जमाखर्च
सास बहु के झगड़ों की
पेचीदगियां और तफसील,
बोरवेल में फसे बच्चों के
जिंदगी और मौत के
टूर्नामेंट की लाइव कवरेज,
जनप्रतिनिधियों में
रुस्तम ए हिंद
दंगल के दांवपेंच,
रजत पटल की कालिख,
जांच कमिशनों का
भाषण चाटण ठठ्ठा,
शेर बाज़ार का सट्टा,
तेजी मंदी के आनंदी,
भालू और नंदी
कुछ भी ना छूटा
उसकी पकड़ से,
बस छूट गए
ढीले होते पेच और
जड़ों में लगी जंग के
समाचार,
और एक रात
भरभरा कर गिर पडा,
झोंपड़पट्टी के
कुछ लोग दब कर मर गए,
लती चिल्ला उठे,
अरे! क्या हुआ ?
कंहा गए सिगनल ?
बिग बोस के घर से
कौन हुआ बेघर ?
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009
महंगाई
कोटिल्य भूले
वस्तु विनिमय छोडा
विश्व बैंक का अंकुश डाला
छतरी तोडी
चद्दर फाडा
भ्रष्टाचारी छत्र संभाला
भेडिया राजा
भेड़ रियाया
भीड़ भ्रामरी अकेले ताला
दिन दल्ले
रात पतुरिया
जिस्म जख्म अस्तित्व छाला
बकरी भगाई
चरखा तोडा
वैश्वीकरण का हाथी पाला
किया उत्सर्जन
तब चिल्लाये
हाय महंगाई मार डाला
.
वस्तु विनिमय छोडा
विश्व बैंक का अंकुश डाला
छतरी तोडी
चद्दर फाडा
भ्रष्टाचारी छत्र संभाला
भेडिया राजा
भेड़ रियाया
भीड़ भ्रामरी अकेले ताला
दिन दल्ले
रात पतुरिया
जिस्म जख्म अस्तित्व छाला
बकरी भगाई
चरखा तोडा
वैश्वीकरण का हाथी पाला
किया उत्सर्जन
तब चिल्लाये
हाय महंगाई मार डाला
.
रविवार, 13 सितंबर 2009
प्रेत
मैं प्रेत को नही जानता
मैं प्रेत को मानता भी नही
परवश होना मेरे लिए
कल्पना की बात है
नियंत्रण की डोर ख़ुद
अपने ही हाथ है
लेकिन यह मान महल
अब कोई कुरेद रहा है
कोई कठफोड़वा प्रेत
विश्वास दरख्त छेद रहा है
जटिल से सहज विकास पथ है
शाश्वत यात्रा विकास रथ है
बात उलझाकर सुलझाना
मेरी फितरत है
पेशे से अध्यापक हूँ
पढाना मेरी किस्मत है
बात अधिक ना उलझाकर
सहज शब्दों में बताता हूँ
कई वर्ष पहले मेरी कक्षा में
दो छात्र थे, यूँ तो कई थे पर
दो विशेष याद है
एक मेधावी दूसरा फिसड्डी
एक शर्ट पेंट पहनता
दूसरा बनियान चड्डी
पहले को पढाने में, मैं करता
अपनी सम्पूर्ण उर्जा समर्पित
दूसरा रहा सदा उपेक्षित
मैं कहता पढ़ना
नही काम तेरा
चपरासी सा काम
करता वो मेरा
पहला दिनों दिन प्रखर होता चला गया
दूसरा आख़िर पढ़ाई छोड़ चला गया
पर ना छोड़ी विनम्रता
सदा करता मेरा सम्मान
जहाँ भी मिलता झुकता
कहता गुरूजी प्रणाम
नियति की माया अनोखी
धूप हँसे और शबनम रोती
बरसों में जो माला पिरोती
एक पल में बिखरे मोती
अब बात को अंजाम तक लाता हूँ
अपनी जिन्दा मौत की दास्ताँ सुनाता हूँ
पहले शिष्य ने परदेश को
देश कबूला हैं
मेरा क्या अपने गाँव का
नाम तक भूला है
एक बार आया
मैं मिलने गया
हाथ में सिगरेट
मुंह फेर लिया
मैं फ़िर फ़िर
जाता रहा उसके पास
मन में लिए यह आस
मुझे पहचाने स्वीकारे
बचपन की शिक्षा का
एहसान माने
वह बेशर्म हर बार
नजरे चुराता रहा
मेरे दिल पर बार बार
हथौडा सा लगा
दूसरा गावं से स्टेशन तक
रिक्शा चलता है
मुझे पैदल चलते देख
आदर से बिठाता है
हर बरस मेरे घर
नारियल रौली पुष्प ले आता है
श्रद्धा से नमन करता
आचमन कराने को
चरण धुलता है
आज फ़िर शिक्षक दिवस है
और वह मेरे घर आया है
रौली का वह टीका देगा
श्रीफल भेंट करेगा वो
कांधे पर माला लादेगा
चरणों में शीश धरेगा वो
मैं पिघलता अन्दर से
घबराता इस मंजर से
चाहता हूँ नमन करना
चाहता उसे गले लगाना, पर
जकड लेता मुझे कोई
पकड़ लेता मुझे कोई
पराधीन मेरी काया है
क्या करूँ ...... ?
एक पुराने अध्यापक के
प्रेत का मुझ पर साया है
.
मैं प्रेत को मानता भी नही
परवश होना मेरे लिए
कल्पना की बात है
नियंत्रण की डोर ख़ुद
अपने ही हाथ है
लेकिन यह मान महल
अब कोई कुरेद रहा है
कोई कठफोड़वा प्रेत
विश्वास दरख्त छेद रहा है
जटिल से सहज विकास पथ है
शाश्वत यात्रा विकास रथ है
बात उलझाकर सुलझाना
मेरी फितरत है
पेशे से अध्यापक हूँ
पढाना मेरी किस्मत है
बात अधिक ना उलझाकर
सहज शब्दों में बताता हूँ
कई वर्ष पहले मेरी कक्षा में
दो छात्र थे, यूँ तो कई थे पर
दो विशेष याद है
एक मेधावी दूसरा फिसड्डी
एक शर्ट पेंट पहनता
दूसरा बनियान चड्डी
पहले को पढाने में, मैं करता
अपनी सम्पूर्ण उर्जा समर्पित
दूसरा रहा सदा उपेक्षित
मैं कहता पढ़ना
नही काम तेरा
चपरासी सा काम
करता वो मेरा
पहला दिनों दिन प्रखर होता चला गया
दूसरा आख़िर पढ़ाई छोड़ चला गया
पर ना छोड़ी विनम्रता
सदा करता मेरा सम्मान
जहाँ भी मिलता झुकता
कहता गुरूजी प्रणाम
नियति की माया अनोखी
धूप हँसे और शबनम रोती
बरसों में जो माला पिरोती
एक पल में बिखरे मोती
अब बात को अंजाम तक लाता हूँ
अपनी जिन्दा मौत की दास्ताँ सुनाता हूँ
पहले शिष्य ने परदेश को
देश कबूला हैं
मेरा क्या अपने गाँव का
नाम तक भूला है
एक बार आया
मैं मिलने गया
हाथ में सिगरेट
मुंह फेर लिया
मैं फ़िर फ़िर
जाता रहा उसके पास
मन में लिए यह आस
मुझे पहचाने स्वीकारे
बचपन की शिक्षा का
एहसान माने
वह बेशर्म हर बार
नजरे चुराता रहा
मेरे दिल पर बार बार
हथौडा सा लगा
दूसरा गावं से स्टेशन तक
रिक्शा चलता है
मुझे पैदल चलते देख
आदर से बिठाता है
हर बरस मेरे घर
नारियल रौली पुष्प ले आता है
श्रद्धा से नमन करता
आचमन कराने को
चरण धुलता है
आज फ़िर शिक्षक दिवस है
और वह मेरे घर आया है
रौली का वह टीका देगा
श्रीफल भेंट करेगा वो
कांधे पर माला लादेगा
चरणों में शीश धरेगा वो
मैं पिघलता अन्दर से
घबराता इस मंजर से
चाहता हूँ नमन करना
चाहता उसे गले लगाना, पर
जकड लेता मुझे कोई
पकड़ लेता मुझे कोई
पराधीन मेरी काया है
क्या करूँ ...... ?
एक पुराने अध्यापक के
प्रेत का मुझ पर साया है
.
बुधवार, 2 सितंबर 2009
chhoti kavitaayen
राजनीति
तिमिर लक्ष्य पर
बढ़ता रथ
भटकी पथ से
हर शपथ
कैसे ?
कौन ?
बताये राह
विवेक सभी का
लहू से
लथपथ
*
उपालंभ
जिस जाडे में
जिस्म जला
जिंदा रखा
तुम्हारी यादों को
उसी में .......
मधुमास तापते
तुम
मेरा नाम तक
भुला बैठे |
*
हंसी
ठहाके महान
पर कुर्बान
उस मुस्कान पर
जो टिकी है
आंसुओं के बांध पर
*
समय
एक और
दिन उगा
काल के
कबूतर ने
जीवन जंगल से
एक और
दाना चुगा
*
विवशता
छाया
लिपट सकती
चूम सकती
नदी को
लेकिन उसमें
नहा नहीं सकती
नदी
छू सकती
महसूस कर सकती
छाया को
लेकिन अपने साथ
बहा नहीं सकती
*
घुटन
कांटें की
चुभन पर
चिल्लाने वालों
कभी सोचा है
उसका दम
घुट रहा है
तुम्हारे जिस्म में
गुरुवार, 11 जून 2009
फागुन में तुझ पिया
शिथिल है सब अंग
गहने तन पर यूँ पडे
चंदन लिपटे भुजंग
*
सहरा सागर एक से
अवसाद और उमंग
मरे सिपाही के लिये
क्या शांति क्या जंग
*
होली रंगोली स्याह हई
इद्रधनुष अपंग
तुझ बिन मन साधू भया
भगवा हुए सब रंग
*
एक अकेले जीव को
नोंचे कई प्रसंग
रसना विजया जब धरी
गगन मन हुआ पतंग
*
होली दीवाली एक सी
सुदामा के संग
धुल धुसरित मुख घूमते
बच्चे नंगधडंग
*
मन फागुन में मस्त है
साठा तन है दंग
गिरि गुफा में नाचता
साधु कोई मलंग
*
तन तांडव करता रहा
ले डमरु ले चंग
नाचा मन का मौर जब
बजने लगा मृदंग
*
सपने टूटे सांझ पडे
मोह हुए सब भंग
कुछ रंग तरसे अंग को
कुछ अंग तरसे रंग
शिथिल है सब अंग
गहने तन पर यूँ पडे
चंदन लिपटे भुजंग
*
सहरा सागर एक से
अवसाद और उमंग
मरे सिपाही के लिये
क्या शांति क्या जंग
*
होली रंगोली स्याह हई
इद्रधनुष अपंग
तुझ बिन मन साधू भया
भगवा हुए सब रंग
*
एक अकेले जीव को
नोंचे कई प्रसंग
रसना विजया जब धरी
गगन मन हुआ पतंग
*
होली दीवाली एक सी
सुदामा के संग
धुल धुसरित मुख घूमते
बच्चे नंगधडंग
*
मन फागुन में मस्त है
साठा तन है दंग
गिरि गुफा में नाचता
साधु कोई मलंग
*
तन तांडव करता रहा
ले डमरु ले चंग
नाचा मन का मौर जब
बजने लगा मृदंग
*
सपने टूटे सांझ पडे
मोह हुए सब भंग
कुछ रंग तरसे अंग को
कुछ अंग तरसे रंग
वह सुबह कभी तो आयेगी
नेह निर्झर
सूख चुका अब
जन अरण्य
उब चुका अब
अब ना मचलता
लहरों के संग
अब ना संवरता
मौसम के संग
नही बहलता
प्रेम गीत से
अविचल हर
हार जीत से
कोकिल कण्ठ
कर्कस क्रन्दन
रिक्त हदय
यांत्रिक स्पन्दन
श्रृध्दा धाम की
शाम उदास
आरती गौण
नगाडे खास
राम तुम्हारे
द्वार लाचार
रावण विराजे
बैखौफ दरबार
वक्र भाल
कदम बेताल
हाल बेहाल
पेट पाताल
उंगली पर तिलक
मुख पर चमक
मत रमत
चयन युघ्द
रण शरण
निरीह रियाया
कभी तो जीत पायेगी
आर ही आर
लडी जा रही लडाई
कभी तो पार जायेगी
सत्ता स्वार्थ का
तिमिर चीर
वह सुबह
कभी तो आयेगी
सूख चुका अब
जन अरण्य
उब चुका अब
अब ना मचलता
लहरों के संग
अब ना संवरता
मौसम के संग
नही बहलता
प्रेम गीत से
अविचल हर
हार जीत से
कोकिल कण्ठ
कर्कस क्रन्दन
रिक्त हदय
यांत्रिक स्पन्दन
श्रृध्दा धाम की
शाम उदास
आरती गौण
नगाडे खास
राम तुम्हारे
द्वार लाचार
रावण विराजे
बैखौफ दरबार
वक्र भाल
कदम बेताल
हाल बेहाल
पेट पाताल
उंगली पर तिलक
मुख पर चमक
मत रमत
चयन युघ्द
रण शरण
निरीह रियाया
कभी तो जीत पायेगी
आर ही आर
लडी जा रही लडाई
कभी तो पार जायेगी
सत्ता स्वार्थ का
तिमिर चीर
वह सुबह
कभी तो आयेगी
भूख
झिलमिलाती प्रकाश झूमरे,
कर्कस संगीत लहरे ,
दर्जनों इत्रों से निर्मित बदबू ,
सभ्य चहरो के मुखौटे ,
मुखौटों पर भी नकली हंसी ,
तस्तरी विश्रामघाट आसीन
उदर-श्मशान-राही व्यंजन ,
रंग बिरंगे वस्त्र ,
उजले-तन काले-मन ,
बिखरे हुए थे उस स्नेहभोज में |
ग्रास झपट पात्र भरते
चरते विचरते
टूट पड़े थे उस गिद्ध भोज में |
उपेक्षित सा मैं
हाथ में प्लेट
खोजी नजरे,
वस्त्र बचाता
नाचता-लचकता
असहाय खडा था उस
नृत्य भोज में |
भक्षी एक दुसरे को देख
गुर्रा नही मुस्करा रहे थे
यही अंतर सभ्यता
मशाल जलाये था
उस खोज भोज में |
तभी ..
एक परिचित मिले :
उखडे उखडे से क्यूँ घूम रहे हो
क्या खो गया जिसे तुम ढूंढ रहे हो
मैंने कहा :
भोज समर के योद्धाओं के मुख पर
तृप्ति का अनुनाद ढूंढ रहा हूँ
और छप्पन भोगो की महफ़िल में
एक अदद स्वाद ढूंढ रहा हूँ
कुछ और कहता उससे पहले
बोल पड़ी एक द्वार भिखारन :
बाबू
क्या कभी
कुछ पल
भूखे रहे हो ?
भूख जो महज
एक शब्द है तुम्हारे लिए
उसे सहे हो ?
जब भूख की आंधी आती है तो,
अच्छा-बुरा
ईमान-धरम
अपना-पराया
सब कुछ उड़ा ले जाती है |
टूट जाते है सब बंधन
कड़ी बस एक
पेट और मुहँ की
शेष रह जाती है |
बच्चो के पेट की ठंडक खातिर
अपना जिस्म जलाना पङता है |
खुद का तन नुचवाने को
गिद्धों को बुलाना पड़ता है |
उस रात की फिर
सहर नहीं होती,
हर रात
कहर होती है |
छोटो की भूख मिटाने को
माँ, जब बड़की को
बेच कर आती है |
तुम्हे क्या मालूम
भूख के मारे
कैसे जीते है |
पेट पर कपडा बांध
राख घोल कर पीते है |
बाबू चाहे जितना खोजो
स्वाद न तुन्हें मिल पायेगा |
ढूढ़ सको तो भूख को ढूंढो
स्वाद खुद चला आयेगा |
कर्कस संगीत लहरे ,
दर्जनों इत्रों से निर्मित बदबू ,
सभ्य चहरो के मुखौटे ,
मुखौटों पर भी नकली हंसी ,
तस्तरी विश्रामघाट आसीन
उदर-श्मशान-राही व्यंजन ,
रंग बिरंगे वस्त्र ,
उजले-तन काले-मन ,
बिखरे हुए थे उस स्नेहभोज में |
ग्रास झपट पात्र भरते
चरते विचरते
टूट पड़े थे उस गिद्ध भोज में |
उपेक्षित सा मैं
हाथ में प्लेट
खोजी नजरे,
वस्त्र बचाता
नाचता-लचकता
असहाय खडा था उस
नृत्य भोज में |
भक्षी एक दुसरे को देख
गुर्रा नही मुस्करा रहे थे
यही अंतर सभ्यता
मशाल जलाये था
उस खोज भोज में |
तभी ..
एक परिचित मिले :
उखडे उखडे से क्यूँ घूम रहे हो
क्या खो गया जिसे तुम ढूंढ रहे हो
मैंने कहा :
भोज समर के योद्धाओं के मुख पर
तृप्ति का अनुनाद ढूंढ रहा हूँ
और छप्पन भोगो की महफ़िल में
एक अदद स्वाद ढूंढ रहा हूँ
कुछ और कहता उससे पहले
बोल पड़ी एक द्वार भिखारन :
बाबू
क्या कभी
कुछ पल
भूखे रहे हो ?
भूख जो महज
एक शब्द है तुम्हारे लिए
उसे सहे हो ?
जब भूख की आंधी आती है तो,
अच्छा-बुरा
ईमान-धरम
अपना-पराया
सब कुछ उड़ा ले जाती है |
टूट जाते है सब बंधन
कड़ी बस एक
पेट और मुहँ की
शेष रह जाती है |
बच्चो के पेट की ठंडक खातिर
अपना जिस्म जलाना पङता है |
खुद का तन नुचवाने को
गिद्धों को बुलाना पड़ता है |
उस रात की फिर
सहर नहीं होती,
हर रात
कहर होती है |
छोटो की भूख मिटाने को
माँ, जब बड़की को
बेच कर आती है |
तुम्हे क्या मालूम
भूख के मारे
कैसे जीते है |
पेट पर कपडा बांध
राख घोल कर पीते है |
बाबू चाहे जितना खोजो
स्वाद न तुन्हें मिल पायेगा |
ढूढ़ सको तो भूख को ढूंढो
स्वाद खुद चला आयेगा |
तुम बिन
सपाट सूनापन
याद कण कण
में पसर जाना,
सजा कर
लपटे जुल्फों की ,
इठलाना बलखाना
संवर जाना ,
बेतरतीब कर के
रूह की सिलवटें मेरी,
दुपट्टे का सर से
उतर जाना,
चमक ले चांद से,
अपने चहरे पर,
तुम और भी
संवर जाना ,
हिचकना कैसा
ये तो है चलन
जमाने का,
चुरा नूर ओरों का ,
खुद और भी
निखर जाना ,
मुझे ना आजमाना
मैं सच का सौदाई हूँ,
अक्स तेरा ही मिटेगा
जो उतरी मेरी कलई
मेरा क्या ,
मैं तो आईना हूँ ,
और
मेरा मुकद्दर है
गिरना,
छनकना,
टूटकर बिखर जाना
-----
सनद
*
अश्क, आहे, लहू होते वसीयत में,
आईनों का अस्थिसंचय नहीं होता
सपाट सूनापन
याद कण कण
में पसर जाना,
सजा कर
लपटे जुल्फों की ,
इठलाना बलखाना
संवर जाना ,
बेतरतीब कर के
रूह की सिलवटें मेरी,
दुपट्टे का सर से
उतर जाना,
चमक ले चांद से,
अपने चहरे पर,
तुम और भी
संवर जाना ,
हिचकना कैसा
ये तो है चलन
जमाने का,
चुरा नूर ओरों का ,
खुद और भी
निखर जाना ,
मुझे ना आजमाना
मैं सच का सौदाई हूँ,
अक्स तेरा ही मिटेगा
जो उतरी मेरी कलई
मेरा क्या ,
मैं तो आईना हूँ ,
और
मेरा मुकद्दर है
गिरना,
छनकना,
टूटकर बिखर जाना
-----
सनद
*
अश्क, आहे, लहू होते वसीयत में,
आईनों का अस्थिसंचय नहीं होता
रविवार, 3 मई 2009
बंधन
.jpg)
प्यार तुम्हारा
दौलत सारे जंहा की
मुट्ठी में ,
अब वही
रेत सा,
उँगलियों के
झरोखों से
रिसा जाता है
लगाव तुम्हारा,
नाचता पारद
करतल पर,
अब वही
कपूर बन
हवा में
घुला जाता है.
वो एक अहसास
कि तुम गैर नहीं
और मैं तुम्हारे
बगैर नहीं,
उम्र की आग में
राख हुआ जाता है.
प्यार - मनुहार
अर्पण-समर्पण
गैर-बगैर
सभी सतही बातें है
वो तो कुछ और ही है
जो बांधे है तुमसे
अबूझ
अनकहा
अपरिभाषित
परे है जो,
वेदना-सवेदना
प्रेषण-संप्रेषण
प्रणय-परिणय
प्राप्य-अप्राप्य परिधि से
सांस हो तुम,
जो शारीर को
शव से भिन्न करती है
पल पल साथ
फिर भी विस्मृत,
लेकिन जब घुटन होती है तो,
तो...... तुम्हे
खीच कर फेफडे में
भरने को मन करता है
शुक्रवार, 1 मई 2009
उपेक्षा
उपेक्षा
जागी उकताई रात ने
पैदा किया एक और
आवारा सूरज
भौर से शाम तक
झुलसता भटकता रहा
कोण बदल बदल कर
देखता रहा
धरा को शायद
छांव मिल जाय
प्यार मिल जाय
पनाह मिल जाय
छांव प्यार पनाह तो दूर
किसी ने एक दृष्टि
ना दी आभार में..........
हर कोई
उपभोग करता रहा
रोशनी का
पर किसी ना देखा
सूरज की और
उपेक्षा की आग
सीने में लिये
जलता रहा दिन भर
थोथे स्वार्थी सम्बन्धो पर
जब घीन्न आने लगी
डूब मरा
समन्दर में जाकर कही........
और रात .......
पुन: गर्भवती हो गईे
*
vinay k joshi
बुधवार, 22 अप्रैल 2009
क्षणिकाएं

क्षणिकाएं
(1)
सहमी सी
डरी सी
हारी सी
निकली थी घर से
नुक्कड़ पर
कई विकल्प खड़े थे,
सच्चाई और साहस
चुन लिए और
जीत गई
*
(२)
हम
ग़म के घरोंदे बन
एकाकी बैठे थे
तुमने छुआ
खुशियों की तितलियाँ
बिखर गई |
*
(३)
अपनों से
बिछडने की रेखा
ह्रदय पर गहरी पड़ी है
पर नवजात के
अधरों की थिरकन
हर बार,
दीवारों पर टंगी
तस्वीरों पर
भारी पड़ी है
*
(४)
श्वेत - श्याम
सपने थे मेरे
फिर एक निशा
तुम आये - मेरे सपने में
और सभी रंगीन हो गए
*
(५)
उल्लासित बेटी
स्वेच्छा प्रणय पर,
-पर माँ की पलकों पर
नमी आ गई.
पूछा जो किसी ने ... क्यूँ ?
तो सिसकी ले बोली
मुझे अपनी माँ
याद आ गई .
*
(६)
फिर
एक बार
शाकाहारी होने की
कसमें खाई
और भेड़ों के
निर्णायक वोटों से
भेड़िये जीत गए
*
विनय के जोशी
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