बुधवार, 27 अगस्त 2008

उस पार

मार्ग अंधेरा हो गया, अभी तो है मंझधार
नैय्‍या फसी तूफान में, खेवय्‍या उस पार

रोज निहारे रूप को, इतराये हर बार
बिन श्रृंगार सीरत रही, कदरदान उस पार

मन का विहग कब का उड़ा तन तन्‍हा लाचार
तैरना ना जानू मैं सखी, सजन खडे उस पार

हाथ बढा हक छीन ले, सच्‍चाई हथियार
क्‍यूं लाचारी ऒढ तू, आस तके उस पार

भक्‍ति शक्‍ति शतगुनी, बिन पूंजी व्‍यापार
जितनी चाहे निपज लो, खरीददार उस पार

तिनके तिनके जमा किये, ले न सके आकार
नव सृजन फिर शुरू करे, आऒ चले उस पार

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

कामचोर

हृदय कुछ
कमजोर हो गया है ।
पूरी क्षमता से
काम नही करता,
शायद कामचोर हो गया है ।
किडनी भी
ठीक नही रहती,
डॉक्‍टर की निग़ाह पर है ।
औरत मर्द एक से दिखते,
बच्‍चे बन्‍दर गढ लेती है ।
थक सी गई है आँखे,
कुछ का कुछ पढ लेती है ।
इतने कामचोरों संग रह कर,
आत्‍मावलोकन कर लेता हूँ ।
पछतावे से हर पल बोझल,
अपनी नज़रे भर लेता हूँ ।
मुझे याद आते वह पल,
जब हम केंटीन में सोते थे ।
घंटों खिड़की पर लाईन लगा कर,
लोग किस्‍मत को रोते थे ।
काम करता मेरे हिस्‍से का,
लम्‍हा-लम्‍हा छीजता था ।
जाने कौन स्‍वेद कणों से
मेरी तनख़ा सींचता था ।

रविवार, 24 अगस्त 2008

सरल बात

सतत प्रयासरत रहते जो
मनुज सदा सराहे जाते
छोटे छोटे कदमो से ही
पर्वत पार कर वो जाते
बूंद बूंद से बादल बन
सम्पूर्ण धरा पर छा जाते
छोटे छोटे लक्ष्यों से ही
लक्ष्य बड़ा सहज पा जाते
.
मुस्कराहट विजय आहट
लघुता से विस्तार पाते
जितना झुके उतना उठे
आदर दे आदर है पाते
कमी खोजते अपने भीतर
बाहर भूरी प्रशंसा पाते
अच्छाई अनुगूँज अनोखी
दिग् दिगन्त द्विगुणित पाते

शनिवार, 23 अगस्त 2008

एक और दिन उगा

एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
लो फिर शुरु हुआ
झुठ कहने और
सुनने का सिलसिला
मन एकाकी औरा ओढे
जन अरण्य मे
भटकने का सिलसिला
विवेक, ह्र्दय, सत्य सोया
बस स्वार्थ है जगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा

मंगलवार, 19 अगस्त 2008

हिम-नद

बरसों के
गिले शिकवे
आँसुओं में
पिघल गये ।
झगड़ने को
लपके थे
नज़रे मिली
और लिपट गये ।

शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

आगे बढ़ता देश हमारा

एक जर्जरित फ्रॉक में
दूसरा उघाड़े बदन
चमड़ी पर मेल की पपड़ियाँ
कूल्हे पर फटी निक्कर
गटर की अविरल धारा
कभी बोतल मिल जाती
कभी मिल जाता
पेप्सी का खाली टिन
दौड़ कर किनारे
बोरी के खजाने में
जमा कर आते
खुश हो जाते
दुगुने उत्साह से
फिर लग जाते
नज़र पड़ी
बहते आधे खाए सेव पर
हाथ से पोंछा
कुछ ख़ुद खाया
कुछ उसे दिया
खाली पेट में कुछ गया
तभी हाथ में पकड़ी
लकड़ी से अटक गया
रंग-बिरंगा एक कपड़ा
डंडा बन गया झंडा
करते कीचड़ में धमाल
अबोध भाई-बहन
संवेद स्वर में गाते रहे
झंडा ऊँचा रहे हमारा
आगे बढ़ता देश हमारा

सोमवार, 11 अगस्त 2008

अजाना गाँव

पलक झपकी

बीत गये

जाने कितने बसन्त

व्यतित होंगे

और कितने

आ जायेगा अन्त

मील के पत्थर

त्वरित आते

गुजर जाते

वर्तमान की झोली

खाली ही पाते

केश मन को

स्याह कर

जाने कब

धवल हो गये

शीशे की दीवारों में

कैद चक्षु कमल

हो गये

चिकने गाल मैदान

नालियों में

ढल गये

स्वार्थ रंजित

मीठे बोल

गालियों में

बदल गये

लाचारी अधर धर

दंत पंक्ति खो गई

तीर सी सधी काया

ढीला धनुष हो गई

मोह का सहरा

रेणु धंसते

पांव है

ना जाने अब दूर कितना

अबुझ अजाना

गांव है

रविवार, 10 अगस्त 2008

तरक्की

हुबहू जिस्म जैसी
मशीन बनाना
जटिल और खर्चीला था
इसलिए जिस्म को ही
मशीन बनाना
तय किया गया
पहले चरण में
नंगेपन से
पाबन्दी हटाई गई
अवाम हक्का-बक्का
शहर बदहवास
निगाहें निगरा की
हवाइयां उड़ी हुई
एक युवक
बाज़ार में दिगम्बर दौड़ा
फ़िर एक तन्वी भी
दफ़न था जो जहन में
हरकत में आने लगा
शर्मीले खुलकर बतियाने लगें
खवातीन गहने की तरह
नंगापन सजाने लगीं
बुजुर्ग ज़माने को
कोसते-खासते
मजा लेने लगें
इसतरह नंगापन
जिस्म पर ही नहीं
रूह में भी पसरता चला गया
अब नंगापन
आम बात है
और जमाना मुकम्मल
तरक्की की राह पर है |

गुरुवार, 7 अगस्त 2008

कांटा

थम जाते हैं कदम
मेरे लिए
चेतना का हर पल
मुझे समर्पित है
हर आह
हर सिसकी
पर रहता है
मेरा नाम
लेकिन
चाहता है हर कोई
मुझे अपने से
अलग करना
नहीं कोई मैं हस्ती
कद में भी नाटा हूं
मैं जिस्म में
चुभा कांटा हूं
चीखों चिल्लाओं
कोहराम मचा दो
पर मुझे तो ना कोसो
अरे तुम्हें तो दर्द है
फकत मेरी चुभन का
मेरा तो
दम घुटा जा रहा है
तुम्हारे जिस्म में

समय चक्र


समय चक्र
भविष्य को रौंद
भूत बना देता है
रह जाते हैं
अस्थियों पर
रेडियम लगाये
यादों के पिंजर
जो राह नहीं दिखाते
याद दिलाते हैं
किन वजहों से
तुम राह भूले

बुधवार, 6 अगस्त 2008

बिजली : क्षणिकाएँ

:-
(१)
शतप्रतिशत
विद्युतीकरण
की प्राप्ति में
छोटी सी कमी
सरकार को
खली न थी
तार था
खम्भा था
बल्ब था
बिजली न थी
(२)
महाभारत
की कथा में
अचानक
सभी भक्तों की
खुशियाँ चली गई
चीर हरण के
दृश्य से पहले
बिजली चली गई
(३)
बिजली के जलते
बल्ब को देखो
कही खुशियाँ
एक स्विच की
मोहताज तो नही ?
(४)
केवल बिजली ही
काफी नही
रोशनी के लिए
अभय भी चाहिए
गुलेल और कंकर से
(५)
एकाकार
राजनीति और बाहुबली
मानों
करंट और बिजली-

मंगलवार, 5 अगस्त 2008

मंहगाई

कोटिल्य भूले
वस्तु विनिमय छोडा
विश्व बैंक का अंकुश डाला
छतरी तोडी
चद्दर फाडा
भ्रष्टाचारी छत्र संभाला
भेडिया राजा
भेड़ रियाया
भीड़ भ्रामरी अकेले ताला
दिन दल्ले
रात पतुरिया
जिस्म जख्म अस्तित्व छाला
बकरी भगाई
चरखा तोडा
वैश्वीकरण का हाथी पाला
किया उत्सर्जन
तब चिल्लाये
हाय महंगाई मार डाला

शनिवार, 2 अगस्त 2008

साथी

आग लगी थी
दिल में
आँसू चला
बुझाने को
अधरों तक
आया तो
सिसकी ने कहा
मैं भी साथ चलती हूँ

मंगलवार, 29 जुलाई 2008

अश्रु सिंचन

भूकंप
जो पिछले दिनों
आया था शहर में
कुछ ज्यादा ही
जोर से था
मैं तो जलजले की
अभ्यस्त थी पर,
मकान में दरारे आ गई
कुछ दिनों बाद
एक कारीगर बुलाया
और मरम्मत करवा दी
जाते-जाते उसने कहा .....
दरारों मे भरी सीमेंट की
तराई करना |
पानी की धार को
सीमेंट ने
एकदम सोंख लिया
मुझे अपने
शहीद बेटे का
पहला दूध पीना
याद आ गया |
फिर तराई के लिए
पानी की जरुरत न रही |

सोमवार, 28 जुलाई 2008

जीवन

भीख में मिला
एक वस्त्र
जिसमे
धोखों के धागों से
टीसों के टांके लगे हैं
जख्मों से भरी जेब और
तन्हाईयों के तमगे लगे है
फ़िर भी
अनमोल है यह
समझ मेरी
कीमत न इसकी
आंक पाती है
क्यूंकि कभी कभी
नजर उनकी
सुई सी चुभती हुई
सुख का एक
बटन टांक जाती है |

अजन्मी

जर्जर काया
पराश्रित जीवन
बुढापा भरी
उस पर नारी .....
मैं कौन ?
मेरी ख्वाहिशे क्या ?
अधेड़ प्रौढ़|
कुल की माया
नाती-पोतों की आया
उपेक्षा के बदले
वारी वारी ........
लहलहाती फसल
खनकता कुन्दन
श्रंगारित दासी
जर जमीन जोरू
जागीरदारी ........
आदमखोर स्वछंद
मासूम कैद
संभल कर चलो
ओ नारी !
अभी हो कुंवारी ....
दूध भैया का .....
खिलौने भैया के ......
स्कूल भैया जाएगा ..........
उफ !
बहुत बुरा है,
दो पैरों का जानवर
अपनी मादा के साथ |
शुक्र है मैं मुक्त हूँ
उन्मुक्त हूँ
जीवन रहा नही
मरण वार दिया
तन तारिणी
वन्ही सागर
पल में पार किया ...
सांसें लेती
लाशों ने मुझे
कोख ही मे मार दिया

शनिवार, 26 जुलाई 2008

माँ

जब धूप पसर जाती
रसोईघर के बाहर
मैं वहां बैठ
अ से अम्मा
लिखा करता
माँ धुएँ के कोहरे में
गुनगुनाती
आटा गूंथती
रोटियां बेलती
और साथ ही बनाती
आटे की छोटी-छोटी गोलियां
फिर उन्हें
आँगन में फैला देती
एक-दो-तीन
कई चिडियां आती
चहचहाती
गोलियां चुगती
सजीव हो जाते
बेलन, कलछी, चिमटा
अग्नि नृत्य करती
चूल्हे की मुंडेर पर
रसोईघर जलसाघर हो जाता
.
अब न घर में माँ हैं
न शहर में चिडियां
बस केवल
आटे की गोलियां बची है
जब कभी तन्हा होता हूँ
कुछ गोलियां बिखेर देता हूँ
और माँ
चिडियां बन
मन के आँगन में
उतर आती है

पितृ क्रम

धीर गंभीर
गृहस्थ फकीर
सटीक मितभाषी
पद्कमल काशी
कसरती काया
बरगदी छाया
तार्किक दार्शनिक
आस्तिक वैज्ञानिक
एक उम्र गुजारी
पिता जैसा
बनने की कोशिश मे |
फ़िर एक दिन
एहसास हुआ
मैं तो
अपने पिता सा
ना बन पाया
मेरा बेटा
मुझ सा बन गया|
हम जो नही है
वह ही सच है
हम जो है
वह भ्रम है |
हर बेटा अपनी उम्र के
पचासवे बरस में
यह कविता लिखता है
यही जीवन क्रम है |

विस्तार संकुचन दैनिक भास्कर रसरंग २९/०६/२००८ को प्रकशित

दैनिक भास्कर रसरंग २९/०६/२००८ को प्रकशित

विस्तार संकुचन

.

कभी गोलू कभी गोटली

कभी पोलू कभी पोटली

कभी बिट्टू कभी किट्टू

कभी पठ्ठा कभी पप्पू

कह कर उसे बुलाता

और वह हर बार

हां पापा !

कह कर दौडा आता

और अब

कभी फादर कभी पापा

कभी ओल्डी कभी डैडी

कभी बाऊसा कभी बापू

कभी काकू कभी दादू

कह कर मुझे बुलाता

और मैं हर बार

हां बेटा !

कह कर दौडा आता

गुरुवार, 24 जुलाई 2008

हे कृष्णा.........


हे कृष्णा........
ये कैसी मृगतृष्णा

दस रचनायें
रखी सामने
एक नई तैयार
मौलिकता अब
बाजार में बिकती
सृजन बना व्यापार
हे कृष्णा.....
ये कैसी मृगतृष्णा

तारीफों के
टोकरे बटोरे
ख़रीदे पुरस्कार
झट गर्दन
घुसा लेते
जहाँ भी देखे हार
हे कृष्णा ....
ये कैसी मृगतृष्णा

लखपति
करोड़ चाहता
करोड़पति अनंत
मुद्रा पिपासु
सतत चलता
इसका आदि ना अंत
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

बड़ी बहन
असुंदर कह कर
छोटी को अपना ली
अब बड़ी
विशिष्ट लगाती
साधारण घरवाली
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

मची भगदड़
पंडितों मध्य
श्राध्दोत्सव के काज
यकृत हृदय
फेफड़े किडनी
उदर बन गए आज
हे कृष्णा ....
ये कैसी मृगतृष्णा

चंगों से नफरत
और दर्दी से
करते प्रेम
स्तेथोस्कोप को
कार्ड समझते
पेशेंट ए टी एम
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

जन्म से ही
दौड़ शुरू और
मृत्यु अन्तिम धाम
मन सीपी का
मोती उपेक्षित
प्यारा लगता चाम
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा
बहुत ढील दे दी तू ने
अब तो कुछ कसना
हे कृष्णा ...

राह थकन
पग छाले भूला
ले दर्शन की आस
उचक-उचक कर
नख-शिख देखूँ
फिर भी ना बुझती प्यास
हे कृष्णा ....
जीवन ज्योत
भले ही बुझ जाय
बनी रहे यह तृष्णा
हे कृष्णा .....


भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

Internationalized Domain Names

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