भूकंप
जो पिछले दिनों
आया था शहर में
कुछ ज्यादा ही
जोर से था
मैं तो जलजले की
अभ्यस्त थी पर
मकान में दरारे आ गई
कुछ दिनों बाद
एक कारीगर बुलाया
और मरम्मत करवा दी
जाते-जाते उसने कहा .....
दरारों मे भरी सीमेंट की
तराई करना |
पानी की धार को
सीमेंट ने
एकदम सोंख लिया
मुझे अपने
शहीद बेटे का
पहला दूध पीना
याद आ गया |
फिर तराई के लिए
पानी की जरुरत न रही |
मंगलवार, 27 जनवरी 2009
हर दुखी का दुखडा मैं था
दर्पण में दिखता
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता |
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से |
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से |
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से |
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ |
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ |
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को |
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था |
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था |
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था |
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया |
मुझ से
परे निकल
"मैं" पा गया |
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता |
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से |
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से |
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से |
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ |
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ |
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को |
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था |
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था |
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था |
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया |
मुझ से
परे निकल
"मैं" पा गया |
सोमवार, 26 जनवरी 2009
मेरा कद
एक सुबह उठा
तो मेरा कद खो गया
मैं हतप्रभ
अब कैसे काम चलेगा
मैं बौना या सामने वाला
कैसे पता लगेगा
अपने कद की तुलना में
औरों के कद
आंक रखे थे
स्वार्थ के पैमाने पर
सबको नाप रखे थे
कौन मेरे पीछे और
किसके पीछे मैं
पूँछ हिलाऊँगा
इसका बोध खो गया
हे भगवान
एक ही रात में
क्या से क्या हो गया
कद का यह भ्रमजाल
मेरा उसका आपका नहीं सबका है
पेश है एक शब्दचित्र
जिसमें नाम फकत मेरा है
शहर से दूर था वह कॉलेज
जिसमें मैं पढ़ता था
कुछ पैदल कुछ
साइकिलों पर आते
मैं पैदल..........
हसरत से देखता साइकिल को
परीक्षा के दिन
एक सेठ पुत्र ने
साइकिल पर बिठा दिया
परीक्षा से महत्वपूर्ण
साइकिल की सवारी होगई
जीवन में पहली बार लगा
मेरा भी कुछ कद है
फिर नौकरी की साइकिल खरीदी
अच्छा लगा
स्कूटर बगल से गुजरता तो
मायूस हो जाता
कद कुछ कम हो जाता
बुढापे मे मोपेड खरीदी
तीस की गति पर
हवाई जहाज का आनंद लिया
पैदल और साइकिल सवारों को देख
नाक-भौं सिकोड़ता
चलने का शउर नहीं
बार-बार ब्रेक लगाना पड़ता है
कद बढ़ने का भ्रम जारी रहा
फिर एक दिन पौत्री ने कहा
दादाजी मम्मी को बैंक से लोन मिला है
घर में कार लायेंगे और
आपको भी खूब घुमायेंगे
पुत्र की भक्ति
पुत्रवधू की श्रद्धा
या दादाजी पर दया
कुछ भी हो
कार की कल्पना ने
कुल मिलाकर मेरा कद
कुछ और बढ़ा ही दिया
और अब चतुर्थ आश्रम
चला चली की तैयारी
कन्धों की सवारी की प्रतिक्षा
लोग कह रहे हैं
पांव विमान से बाहर है
इन्हें ढँकों.......
मेरा कद ......?
शनिवार, 17 जनवरी 2009
एकाकी
चला गया मुझको ठुकरा कर
कौन रहा सदा अपना
भौर भये जैसे कोई
टूट गया मीठा सपना
-
खोटा सौदा बनी जिन्दगी
बिखर गए सच्चे आने
उखड़ी सांसे थाम खड़ी है
जिंदा मौत सिरहाने
-
तन के तीरथ कब के उजडे
मांस विहीन अस्थि पत्थर
उजड़ी आँखे साए तकती
फटी बिवाई पग थर थर
-
खून के रिश्ते कब के रिस गए
टूट गए कच्चे धागे
एकाकी जीवन का बीहड़
पसरा है इसके आगे
साँस्कृतिक दमन
दो फूल उगे,
मुस्कराये,
आंखें खोली,
मां के आंचल में
अमृत चखा,
घुटने चले
थोडी दूर,
और गली के
गुलमोहर हो गये ।
फ़िर हुआ आक्रमण
ध्वनी तरंगो का
ठिठके और भाग लिये
घर के भीतर,
टकटकी लगाये
देखने लगे
रोशन आयत ।
यकायक
हाथों में उग आये
गिल्ली डंडे की जगह
बन्दुक और चाकू,
अमृत कलश
जहरीले कौतुक बन गये
खत्म हो गया
जड और चेतन में फ़र्क ।
लहुलुहान पर्दे पर
उभर आया
आप देख रहे है
फ़लाना नेटवर्क ।
मुस्कराये,
आंखें खोली,
मां के आंचल में
अमृत चखा,
घुटने चले
थोडी दूर,
और गली के
गुलमोहर हो गये ।
फ़िर हुआ आक्रमण
ध्वनी तरंगो का
ठिठके और भाग लिये
घर के भीतर,
टकटकी लगाये
देखने लगे
रोशन आयत ।
यकायक
हाथों में उग आये
गिल्ली डंडे की जगह
बन्दुक और चाकू,
अमृत कलश
जहरीले कौतुक बन गये
खत्म हो गया
जड और चेतन में फ़र्क ।
लहुलुहान पर्दे पर
उभर आया
आप देख रहे है
फ़लाना नेटवर्क ।
मंगलवार, 23 दिसंबर 2008
नजर अव नीर नहीं रखती
मुहब्बत अब
हीर नही रखती
गजल अब
मीर नही रखती
जठर की आग से
भाप बन उड गया
नज़र अब
नीर नहीं रखती
दौलते फ़रेब
साथ हो तो आना
राजनीति अब
फ़कीर नही रखती
भीष्म सोये है
बारुद के ढेर पर
सियासत अब
तीर नही रखती
हरण क्या करेगा
दुर्योधन बेबस
द्रोपदी अब
चीर नही रखती
सभी कुटिया में
आमंत्रित है सादर
सीता अब
लकीर नही रखती
लिफ्ट पर आसक्त
भूली सीढी दर सीढी
नई उमर अब
धीर नहीं रखती
नि:शब्द कत्ल होती
चौराहे पर
इंसानियत अब
पीर नही रखती
हीर नही रखती
गजल अब
मीर नही रखती
जठर की आग से
भाप बन उड गया
नज़र अब
नीर नहीं रखती
दौलते फ़रेब
साथ हो तो आना
राजनीति अब
फ़कीर नही रखती
भीष्म सोये है
बारुद के ढेर पर
सियासत अब
तीर नही रखती
हरण क्या करेगा
दुर्योधन बेबस
द्रोपदी अब
चीर नही रखती
सभी कुटिया में
आमंत्रित है सादर
सीता अब
लकीर नही रखती
लिफ्ट पर आसक्त
भूली सीढी दर सीढी
नई उमर अब
धीर नहीं रखती
नि:शब्द कत्ल होती
चौराहे पर
इंसानियत अब
पीर नही रखती
सोमवार, 8 दिसंबर 2008
मंगलवार, 2 दिसंबर 2008
अब न धड़कता दिल मेरा
अब न
मचलता दिल मेरा
अब न
धड़कता दिल मेरा
एक निशा
झोली में डाले
भोर से पहले
विदा हुए
क्षितिज पथ,
अनहद प्रतीक्षा
नयन सावन एक हुए
साँस आखरी,
वंदे मातरम
उल्लासित मन
क्षत विक्षित तन
रक्त श्वेद श्रृंगार धरे
धूल धरा तुम एक हुए
आज गर्व से मस्तक ऊँचा
पर नही शेष कुछ जीने में
जिस पत्थर से
चूड़ी तोडी
उसे रख लिया सीने में
अब न
धड़कता दिल मेरा
अब न
मचलता दिल
.
विनय के जोशी
मंगलवार, 18 नवंबर 2008
तन्हाई की दर्द से शादी है
छले गये जो उजालों की घात में
अंधेरों से लिपट कर रोयेगें रात में
रोशनी मेहमां थी अंधेरों की रात भर
सुबह सूरज ले के आयी सौ्गात में
भीगें सहरा को धूप मरहम सी लगी
फ़फ़ौले हो गये थे बरसात में
फ़ंसी मछली हंसा परिन्दा
भरोसा और आदमी की जात में
नदी समा गई समन्दर में
कनारे उलझे रहे औकात में
तन्हाई की दर्द से शादी है
सितारों तुम भी आना बारात में
विनय
अंधेरों से लिपट कर रोयेगें रात में
रोशनी मेहमां थी अंधेरों की रात भर
सुबह सूरज ले के आयी सौ्गात में
भीगें सहरा को धूप मरहम सी लगी
फ़फ़ौले हो गये थे बरसात में
फ़ंसी मछली हंसा परिन्दा
भरोसा और आदमी की जात में
नदी समा गई समन्दर में
कनारे उलझे रहे औकात में
तन्हाई की दर्द से शादी है
सितारों तुम भी आना बारात में
विनय
बुधवार, 12 नवंबर 2008
पुनर्जन्म
दो झोले लेकर चला था
मैं सफर को
एक में पाप बटोरने थे
एक में पुण्य
राह में एक तरफ पाप
दूसरी तरफ पुण्य
बिखरे पड़े थे
पाप की राह में छांव थी
शीतल जल ..... लुभावना संगीत
खुशबुएँ ........... रसीले स्वाद
सुर......सुरा....सुंदरियाँ ...
क्या नही था
सब कुछ लुभावना
अपना सा था
पराया कुछ भी नही था
दूसरी तरफ कुछ नही था सहज
धूप में तपते पत्थर
नि:शब्द रुदन ...
रहस्यमयी सिसकियाँ .....
हर तरफ़ मदद को पुकारते हाथ उग रहे थे
हर तर्जनी की पौर पर ठहरा था एक आंसू
जो फकत मेरी रूह की छुअन चाहता था
मगर छूना तो दूर
मैं उस तरफ़ देख भी ना सका
किसी एक आंख वाले ऊंट की तरह
एक तरफ चरता चला गया
और पापों से अपनी झोली भरता चला गया
धीरे धीरे बोझ से मेरा जिस्म
एक ओर झुकता चला गया
और फ़िर एक दिन
अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ
पाप के लहराते समंदर में जा गिरा
तभी
कुछ हाथ आगे बढे
मेरे डूबते सर पर
सफेद टोपी पहना दी
.........और................
मेरे सभी पाप
पुण्य में बदल गए
,
विनय के जोशी
मैं सफर को
एक में पाप बटोरने थे
एक में पुण्य
राह में एक तरफ पाप
दूसरी तरफ पुण्य
बिखरे पड़े थे
पाप की राह में छांव थी
शीतल जल ..... लुभावना संगीत
खुशबुएँ ........... रसीले स्वाद
सुर......सुरा....सुंदरियाँ ...
क्या नही था
सब कुछ लुभावना
अपना सा था
पराया कुछ भी नही था
दूसरी तरफ कुछ नही था सहज
धूप में तपते पत्थर
नि:शब्द रुदन ...
रहस्यमयी सिसकियाँ .....
हर तरफ़ मदद को पुकारते हाथ उग रहे थे
हर तर्जनी की पौर पर ठहरा था एक आंसू
जो फकत मेरी रूह की छुअन चाहता था
मगर छूना तो दूर
मैं उस तरफ़ देख भी ना सका
किसी एक आंख वाले ऊंट की तरह
एक तरफ चरता चला गया
और पापों से अपनी झोली भरता चला गया
धीरे धीरे बोझ से मेरा जिस्म
एक ओर झुकता चला गया
और फ़िर एक दिन
अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ
पाप के लहराते समंदर में जा गिरा
तभी
कुछ हाथ आगे बढे
मेरे डूबते सर पर
सफेद टोपी पहना दी
.........और................
मेरे सभी पाप
पुण्य में बदल गए
,
विनय के जोशी
शनिवार, 25 अक्टूबर 2008
कुछ दोहे
मोर पपिहा खेजडी, करता रहा तलाश ।
धीरे धीरे मिट गया, बादल एक आकाश।।
.
टपटप टपके टापरा, पिया गये परडेर ।
बरखा से काली पडी, नजर कूप मुण्डेर।।
.
पूरनमासी शरद की, अमी पयस बरसात ।
अंक यामिनी गुलमुहर, झुलसा सारी रात।।
.
असली सूरत लापता, मुह खोटे अनगीन।
जैसा ओसर सामने, मुखडे पर धर लीन।।
.
हेम रजत झंकार नित, गूंजे जाके कान।
गाली सी वाको लगे, आरती अरु अजान।।
.
अंधियारा मावस भरा, रोशन बिन्दु प्रहार।
अभिकर्ता जुगनू हुए , चंदा करे व्यापार।
,
विनय के जोशी
धीरे धीरे मिट गया, बादल एक आकाश।।
.
टपटप टपके टापरा, पिया गये परडेर ।
बरखा से काली पडी, नजर कूप मुण्डेर।।
.
पूरनमासी शरद की, अमी पयस बरसात ।
अंक यामिनी गुलमुहर, झुलसा सारी रात।।
.
असली सूरत लापता, मुह खोटे अनगीन।
जैसा ओसर सामने, मुखडे पर धर लीन।।
.
हेम रजत झंकार नित, गूंजे जाके कान।
गाली सी वाको लगे, आरती अरु अजान।।
.
अंधियारा मावस भरा, रोशन बिन्दु प्रहार।
अभिकर्ता जुगनू हुए , चंदा करे व्यापार।
,
विनय के जोशी
रविवार, 12 अक्टूबर 2008
क्षणिकाएं
(१)
जल
छू सकता
महसूस कर सकता
छाया को
लेकिन, अपने साथ
बहा नही सकता
(२)
छाया
लिपट सकती
चूम सकती
जल से
लेकिन, उसमें
नहा नही सकती
(३)
पेड़
अचल तन मन
मनस्वी
नदी छाया के
खेल से अविचलित
तपस्वी
(४)
नदी
पहाड़ से बिछडती
विलाप करती
कितनी शांत जब
सागर से
मिलाप करती
(५)
पहाड़
उर की आग
मन का गुबार
घुटन का उभार
(६)
बादल
रुई के
उड़ते फोहे नम
पहाड़ के
जख्मों पर
लगाते मरहम
(७)
फूल
अम्बर को
स्वीकार
माटी का
आभार
.
विनय के जोशी
जल
छू सकता
महसूस कर सकता
छाया को
लेकिन, अपने साथ
बहा नही सकता
(२)
छाया
लिपट सकती
चूम सकती
जल से
लेकिन, उसमें
नहा नही सकती
(३)
पेड़
अचल तन मन
मनस्वी
नदी छाया के
खेल से अविचलित
तपस्वी
(४)
नदी
पहाड़ से बिछडती
विलाप करती
कितनी शांत जब
सागर से
मिलाप करती
(५)
पहाड़
उर की आग
मन का गुबार
घुटन का उभार
(६)
बादल
रुई के
उड़ते फोहे नम
पहाड़ के
जख्मों पर
लगाते मरहम
(७)
फूल
अम्बर को
स्वीकार
माटी का
आभार
.
विनय के जोशी
मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008
रंग
लाल हरे
नीले पीले
एक दूजे से मिल
फिर-फिर,
नये-नये
रंग बनाते रंग,
रंग बिरंगे रंग
बिखेर दिए तुमने
हर टहनी पर
हवा संग लहराती टहनियाँ ,
आसमान में रंग भरती टहनियाँ
गगन में अगन और
बदन में बरखा के अभी
कुछ ही रंग भरे थे कि
तुम चल दिए लाम पर
कलेवा और कसमें
दी थी राह के लिए,
तुम तो रंग भी समेट ले गए
लेकर गए हजारों,
लौटे केवल तीन लेकर
नयन नीर का तर्पण देकर
इन्द्रचाप से मुख मोड़ लिया
तस्वीर तुम्हारी सजा केसरिया
दर्पण से नाता तोड़ लिया
बीज सहेजा था जो उर में
हरा उससे जोड़ लिया
सौगात तुम्हारी सर माथे
रंग सफेद ख़ुद ओढ़ लिया
.
विनय के जोशी
नीले पीले
एक दूजे से मिल
फिर-फिर,
नये-नये
रंग बनाते रंग,
रंग बिरंगे रंग
बिखेर दिए तुमने
हर टहनी पर
हवा संग लहराती टहनियाँ ,
आसमान में रंग भरती टहनियाँ
गगन में अगन और
बदन में बरखा के अभी
कुछ ही रंग भरे थे कि
तुम चल दिए लाम पर
कलेवा और कसमें
दी थी राह के लिए,
तुम तो रंग भी समेट ले गए
लेकर गए हजारों,
लौटे केवल तीन लेकर
नयन नीर का तर्पण देकर
इन्द्रचाप से मुख मोड़ लिया
तस्वीर तुम्हारी सजा केसरिया
दर्पण से नाता तोड़ लिया
बीज सहेजा था जो उर में
हरा उससे जोड़ लिया
सौगात तुम्हारी सर माथे
रंग सफेद ख़ुद ओढ़ लिया
.
विनय के जोशी
सोमवार, 6 अक्टूबर 2008
घुटन
थम जाते है
कदम मेरे लिए
चेतना का हर पल
मुझे समर्पित है
हर आह
हर सिसकी पर
रहता है मेरा नाम
लेकिन हर एक को
अपने से अलग
करने की कोशिश में पाता हूँ
मै
जिस्म में चुभा कांटा हूँ
चीखो
चिल्लाओ
कोहराम मचा दो
पर मुझे तो ना कोसो
अरे !
तुम्हे तो फकत
मेरी चुभन का ही दर्द है
मेरा तो
दम घुटा जा रहा है
तुम्हारे जिस्म में
.
विनय क जोशी
कदम मेरे लिए
चेतना का हर पल
मुझे समर्पित है
हर आह
हर सिसकी पर
रहता है मेरा नाम
लेकिन हर एक को
अपने से अलग
करने की कोशिश में पाता हूँ
मै
जिस्म में चुभा कांटा हूँ
चीखो
चिल्लाओ
कोहराम मचा दो
पर मुझे तो ना कोसो
अरे !
तुम्हे तो फकत
मेरी चुभन का ही दर्द है
मेरा तो
दम घुटा जा रहा है
तुम्हारे जिस्म में
.
विनय क जोशी
रविवार, 5 अक्टूबर 2008
बुधवार, 1 अक्टूबर 2008
शहर के पेड़
अट्टालिकाओं
निर्मित कुआँ
खासंते वाहन
उगलते धुआं
सुलगती चिमनियाँ
जहरीले आगार
जबरन तन नौचते
विद्युत भुजंग तार
ज्ञापन विज्ञापन
छाती में कीले
दिल खुरचे
नाम छीले
छिकती खिड़कियाँ
बेसुध वातायन
उतावले राहगीर
घृणित सिंचन
फ़िर भी
जिन्दा है
सब कुछ सहते
सभ्यों की
असभ्यता
उर में धरते
क्यूँ कि,
पेड़ आत्महत्या
नही करते
.
विनय के जोशी
निर्मित कुआँ
खासंते वाहन
उगलते धुआं
सुलगती चिमनियाँ
जहरीले आगार
जबरन तन नौचते
विद्युत भुजंग तार
ज्ञापन विज्ञापन
छाती में कीले
दिल खुरचे
नाम छीले
छिकती खिड़कियाँ
बेसुध वातायन
उतावले राहगीर
घृणित सिंचन
फ़िर भी
जिन्दा है
सब कुछ सहते
सभ्यों की
असभ्यता
उर में धरते
क्यूँ कि,
पेड़ आत्महत्या
नही करते
.
विनय के जोशी
शनिवार, 27 सितंबर 2008
मिनी के होस्टल जाने पर
मैं
रो नहीं रहा
यह तो कुछ अन्यायी
पलों की किरचें है
जो पलकों के किनारे
चुभ गई है
बस उन्हे निकालने को
आँखों से पानी
बह चला हैं
तुम्हारा भाई मुक्त उन्मुक्त
पर तुम्हे खिड़की से झांकना भी मना
तुम्हारे कपडों का
जाँच और बहस के बाद
तय किया जाना
मैं बाजार से आता
तुम सहमी पढ़ती होती
भाई कम्प्यूटर पर
मोबाईल
दोस्त
अंतरजाल
तुम्हें वार्जित ,
वर्जित तुम्हारा ऊँचा बोलना
तेज आवाज मे गाना
आरोपों का उत्तर देना
ओह !
फ़िर सब कुछ धुंधला हो गया
मैं रो थोड़े ही रहा हूँ
मुझे रोने की
फुर्सत भी नही है
रोना मेरे लिए विलासिता है
अभी तो हर पल
मेरे अहसास को
तुम्हारे साथ रखना है
जो तुम्हे बेटी होने की
याद दिलाता रहे
मैं रो नही रहा
यह तो कुछ
अन्यायी पलों की किरचे है
जो पलकों के किनारे खरोंच जाती है
रंगहीन लहु नजरों के साहिल से
छलक जाता है
मैं रो नही रहा ........
रोऊंगा तो तब
जब तुम
ससुराल चली जाओगी
क्योंकिं
तब मैं तुम्हारी चौकसी
किसी और को सौंप
बेरोजगार हो जाऊंगा
.
विनय के जोशी
रो नहीं रहा
यह तो कुछ अन्यायी
पलों की किरचें है
जो पलकों के किनारे
चुभ गई है
बस उन्हे निकालने को
आँखों से पानी
बह चला हैं
तुम्हारा भाई मुक्त उन्मुक्त
पर तुम्हे खिड़की से झांकना भी मना
तुम्हारे कपडों का
जाँच और बहस के बाद
तय किया जाना
मैं बाजार से आता
तुम सहमी पढ़ती होती
भाई कम्प्यूटर पर
मोबाईल
दोस्त
अंतरजाल
तुम्हें वार्जित ,
वर्जित तुम्हारा ऊँचा बोलना
तेज आवाज मे गाना
आरोपों का उत्तर देना
ओह !
फ़िर सब कुछ धुंधला हो गया
मैं रो थोड़े ही रहा हूँ
मुझे रोने की
फुर्सत भी नही है
रोना मेरे लिए विलासिता है
अभी तो हर पल
मेरे अहसास को
तुम्हारे साथ रखना है
जो तुम्हे बेटी होने की
याद दिलाता रहे
मैं रो नही रहा
यह तो कुछ
अन्यायी पलों की किरचे है
जो पलकों के किनारे खरोंच जाती है
रंगहीन लहु नजरों के साहिल से
छलक जाता है
मैं रो नही रहा ........
रोऊंगा तो तब
जब तुम
ससुराल चली जाओगी
क्योंकिं
तब मैं तुम्हारी चौकसी
किसी और को सौंप
बेरोजगार हो जाऊंगा
.
विनय के जोशी
गुरुवार, 25 सितंबर 2008
मैं
दर्पण में दिखता
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया
मुझ से
परे "मैं" पा गया
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया
मुझ से
परे "मैं" पा गया
रविवार, 21 सितंबर 2008
यादें
किरणों के
पांखी तो
दिन
माह
बरस को
यादों में बदल
उड़ जाते है,
रह जाते है हम
सुनसान द्वीप में
धधकते ज्वालामुखी की तरह
बूंद बूंद झुलसते सपने
राख राख उछलते लम्हे
जलते
पिघलते
उबलते
तह दर तह
जमा होते अहसास
पर्वत के अश्रु
पत्थर होने से लेकर
सूरज के कदमों तले
रौंदे जाने तक
संज्ञाशून्य बने रहना है
या........
दर्द का ज्वालामुखी
सीने में दफ़न किए
एक दिन ख़ुद ही
दफ़न हो जाना है |
.
विनय के जोशी
पांखी तो
दिन
माह
बरस को
यादों में बदल
उड़ जाते है,
रह जाते है हम
सुनसान द्वीप में
धधकते ज्वालामुखी की तरह
बूंद बूंद झुलसते सपने
राख राख उछलते लम्हे
जलते
पिघलते
उबलते
तह दर तह
जमा होते अहसास
पर्वत के अश्रु
पत्थर होने से लेकर
सूरज के कदमों तले
रौंदे जाने तक
संज्ञाशून्य बने रहना है
या........
दर्द का ज्वालामुखी
सीने में दफ़न किए
एक दिन ख़ुद ही
दफ़न हो जाना है |
.
विनय के जोशी
मंगलवार, 16 सितंबर 2008
मुक्तक
सच्ची
फ़तह वही
जो खुशी दे
हासिल से
चूक तक
सच्चा
कवित्त वही
जिसे पढ
हिल जाये
वाचाल से
मूक तक
> विनय के जोशी
फ़तह वही
जो खुशी दे
हासिल से
चूक तक
सच्चा
कवित्त वही
जिसे पढ
हिल जाये
वाचाल से
मूक तक
> विनय के जोशी
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