मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

महंगाई

कोटिल्य भूले
वस्तु विनिमय छोडा
विश्व बैंक का अंकुश डाला
छतरी तोडी
चद्दर फाडा
भ्रष्टाचारी छत्र संभाला
भेडिया राजा
भेड़ रियाया
भीड़ भ्रामरी अकेले ताला
दिन दल्ले
रात पतुरिया
जिस्म जख्म अस्तित्व छाला
बकरी भगाई
चरखा तोडा
वैश्वीकरण का हाथी पाला
किया उत्सर्जन
तब चिल्लाये
हाय महंगाई मार डाला
.

रविवार, 13 सितंबर 2009

प्रेत

मैं प्रेत को नही जानता
मैं प्रेत को मानता भी नही
परवश होना मेरे लिए
कल्पना की बात है
नियंत्रण की डोर ख़ुद
अपने ही हाथ है
लेकिन यह मान महल
अब कोई कुरेद रहा है
कोई कठफोड़वा प्रेत
विश्वास दरख्त छेद रहा है
जटिल से सहज विकास पथ है
शाश्वत यात्रा विकास रथ है
बात उलझाकर सुलझाना
मेरी फितरत है
पेशे से अध्यापक हूँ
पढाना मेरी किस्मत है
बात अधिक ना उलझाकर
सहज शब्दों में बताता हूँ
कई वर्ष पहले मेरी कक्षा में
दो छात्र थे, यूँ तो कई थे पर
दो विशेष याद है
एक मेधावी दूसरा फिसड्डी
एक शर्ट पेंट पहनता
दूसरा बनियान चड्डी
पहले को पढाने में, मैं करता
अपनी सम्पूर्ण उर्जा समर्पित
दूसरा रहा सदा उपेक्षित
मैं कहता पढ़ना
नही काम तेरा
चपरासी सा काम
करता वो मेरा
पहला दिनों दिन प्रखर होता चला गया
दूसरा आख़िर पढ़ाई छोड़ चला गया
पर ना छोड़ी विनम्रता
सदा करता मेरा सम्मान
जहाँ भी मिलता झुकता
कहता गुरूजी प्रणाम
नियति की माया अनोखी
धूप हँसे और शबनम रोती
बरसों में जो माला पिरोती
एक पल में बिखरे मोती
अब बात को अंजाम तक लाता हूँ
अपनी जिन्दा मौत की दास्ताँ सुनाता हूँ
पहले शिष्य ने परदेश को
देश कबूला हैं
मेरा क्या अपने गाँव का
नाम तक भूला है
एक बार आया
मैं मिलने गया
हाथ में सिगरेट
मुंह फेर लिया
मैं फ़िर फ़िर
जाता रहा उसके पास
मन में लिए यह आस
मुझे पहचाने स्वीकारे
बचपन की शिक्षा का
एहसान माने
वह बेशर्म हर बार
नजरे चुराता रहा
मेरे दिल पर बार बार
हथौडा सा लगा
दूसरा गावं से स्टेशन तक
रिक्शा चलता है
मुझे पैदल चलते देख
आदर से बिठाता है
हर बरस मेरे घर
नारियल रौली पुष्प ले आता है
श्रद्धा से नमन करता
आचमन कराने को
चरण धुलता है
आज फ़िर शिक्षक दिवस है
और वह मेरे घर आया है
रौली का वह टीका देगा
श्रीफल भेंट करेगा वो
कांधे पर माला लादेगा
चरणों में शीश धरेगा वो
मैं पिघलता अन्दर से
घबराता इस मंजर से
चाहता हूँ नमन करना
चाहता उसे गले लगाना, पर
जकड लेता मुझे कोई
पकड़ लेता मुझे कोई
पराधीन मेरी काया है
क्या करूँ ...... ?
एक पुराने अध्यापक के
प्रेत का मुझ पर साया है
.

बुधवार, 2 सितंबर 2009

chhoti kavitaayen

राजनीति


तिमिर लक्ष्य पर
बढ़ता रथ
भटकी पथ से
हर शपथ
कैसे ?
कौन ?
बताये राह
विवेक सभी का
लहू से
लथपथ
*


उपालंभ


जिस जाडे में
जिस्म जला
जिंदा रखा
तुम्हारी यादों को
उसी में .......
मधुमास तापते
तुम
मेरा नाम तक
भुला बैठे |
*


हंसी


ठहाके महान
पर कुर्बान
उस मुस्कान पर
जो टिकी है
आंसुओं के बांध पर
*

समय


एक और
दिन उगा
काल के
कबूतर ने
जीवन जंगल से
एक और
दाना चुगा
*


विवशता


छाया
लिपट सकती
चूम सकती
नदी को
लेकिन उसमें
नहा नहीं सकती
नदी
छू सकती
महसूस कर सकती
छाया को
लेकिन अपने साथ
बहा नहीं सकती
*


घुटन


कांटें की
चुभन पर
चिल्लाने वालों
कभी सोचा है
उसका दम
घुट रहा है
तुम्हारे जिस्म में

गुरुवार, 11 जून 2009

फागुन में तुझ पिया
शिथिल है सब अंग
गहने तन पर यूँ पडे
चंदन लिपटे भुजंग
*
सहरा सागर एक से
अवसाद और उमंग
मरे सिपाही के लिये
क्या शांति क्या जंग
*
होली रंगोली स्याह हई
इद्रधनुष अपंग
तुझ बिन मन साधू भया
भगवा हुए सब रंग
*
एक अकेले जीव को
नोंचे कई प्रसंग
रसना विजया जब धरी
गगन मन हुआ पतंग
*
होली दीवाली एक सी
सुदामा के संग
धुल धुसरित मुख घूमते
बच्चे नंगधडंग
*
मन फागुन में मस्त है
साठा तन है दंग
गिरि गुफा में नाचता
साधु कोई मलंग
*
तन तांडव करता रहा
ले डमरु ले चंग
नाचा मन का मौर जब
बजने लगा मृदंग
*
सपने टूटे सांझ पडे
मोह हुए सब भंग
कुछ रंग तरसे अंग को
कुछ अंग तरसे रंग

वह सुबह कभी तो आयेगी

नेह निर्झर
सूख चुका अब
जन अरण्य
उब चुका अब
अब ना मचलता
लहरों के संग
अब ना संवरता
मौसम के संग
नही बहलता
प्रेम गीत से
अविचल हर
हार जीत से
कोकिल कण्ठ
कर्कस क्रन्दन
रिक्त हदय
यांत्रिक स्पन्दन
श्रृध्दा धाम की
शाम उदास
आरती गौण
नगाडे खास
राम तुम्हारे
द्वार लाचार
रावण विराजे
बैखौफ दरबार
वक्र भाल
कदम बेताल
हाल बेहाल
पेट पाताल
उंगली पर तिलक
मुख पर चमक
मत रमत
चयन युघ्द
रण शरण
निरीह रियाया
कभी तो जीत पायेगी
आर ही आर
लडी जा रही लडाई
कभी तो पार जायेगी
सत्ता स्वार्थ का
तिमिर चीर
वह सुबह
कभी तो आयेगी

भूख

झिलमिलाती प्रकाश झूमरे,
कर्कस संगीत लहरे ,
दर्जनों इत्रों से निर्मित बदबू ,
सभ्य चहरो के मुखौटे ,
मुखौटों पर भी नकली हंसी ,
तस्तरी विश्रामघाट आसीन
उदर-श्मशान-राही व्यंजन ,
रंग बिरंगे वस्त्र ,
उजले-तन काले-मन ,
बिखरे हुए थे उस स्नेहभोज में |
ग्रास झपट पात्र भरते
चरते विचरते
टूट पड़े थे उस गिद्ध भोज में |
उपेक्षित सा मैं
हाथ में प्लेट
खोजी नजरे,
वस्त्र बचाता
नाचता-लचकता
असहाय खडा था उस
नृत्य भोज में |
भक्षी एक दुसरे को देख
गुर्रा नही मुस्करा रहे थे
यही अंतर सभ्यता
मशाल जलाये था
उस खोज भोज में |

तभी ..
एक परिचित मिले :
उखडे उखडे से क्यूँ घूम रहे हो
क्या खो गया जिसे तुम ढूंढ रहे हो
मैंने कहा :
भोज समर के योद्धाओं के मुख पर
तृप्ति का अनुनाद ढूंढ रहा हूँ
और छप्पन भोगो की महफ़िल में
एक अदद स्वाद ढूंढ रहा हूँ
कुछ और कहता उससे पहले
बोल पड़ी एक द्वार भिखारन :
बाबू
क्या कभी
कुछ पल
भूखे रहे हो ?
भूख जो महज
एक शब्द है तुम्हारे लिए
उसे सहे हो ?
जब भूख की आंधी आती है तो,
अच्छा-बुरा
ईमान-धरम
अपना-पराया
सब कुछ उड़ा ले जाती है |
टूट जाते है सब बंधन
कड़ी बस एक
पेट और मुहँ की
शेष रह जाती है |
बच्चो के पेट की ठंडक खातिर
अपना जिस्म जलाना पङता है |
खुद का तन नुचवाने को
गिद्धों को बुलाना पड़ता है |
उस रात की फिर
सहर नहीं होती,
हर रात
कहर होती है |
छोटो की भूख मिटाने को
माँ, जब बड़की को
बेच कर आती है |
तुम्हे क्या मालूम
भूख के मारे
कैसे जीते है |
पेट पर कपडा बांध
राख घोल कर पीते है |
बाबू चाहे जितना खोजो
स्वाद न तुन्हें मिल पायेगा |
ढूढ़ सको तो भूख को ढूंढो
स्वाद खुद चला आयेगा |
तुम बिन
सपाट सूनापन
याद कण कण
में पसर जाना,
सजा कर
लपटे जुल्फों की ,
इठलाना बलखाना
संवर जाना ,
बेतरतीब कर के
रूह की सिलवटें मेरी,
दुपट्टे का सर से
उतर जाना,
चमक ले चांद से,
अपने चहरे पर,
तुम और भी
संवर जाना ,
हिचकना कैसा
ये तो है चलन
जमाने का,
चुरा नूर ओरों का ,
खुद और भी
निखर जाना ,
मुझे ना आजमाना
मैं सच का सौदाई हूँ,
अक्स तेरा ही मिटेगा
जो उतरी मेरी कलई
मेरा क्या ,
मैं तो आईना हूँ ,
और
मेरा मुकद्दर है
गिरना,
छनकना,
टूटकर बिखर जाना
-----
सनद
*
अश्क, आहे, लहू होते वसीयत में,
आईनों का अस्थिसंचय नहीं होता

रविवार, 3 मई 2009

बंधन


प्यार तुम्हारा
दौलत सारे जंहा की
मुट्ठी में ,
अब वही
रेत सा,
उँगलियों के
झरोखों से
रिसा जाता है
लगाव तुम्हारा,
नाचता पारद
करतल पर,
अब वही
कपूर बन
हवा में
घुला जाता है.
वो एक अहसास
कि तुम गैर नहीं
और मैं तुम्हारे
बगैर नहीं,
उम्र की आग में
राख हुआ जाता है.
प्यार - मनुहार
अर्पण-समर्पण
गैर-बगैर
सभी सतही बातें है
वो तो कुछ और ही है
जो बांधे है तुमसे
अबूझ
अनकहा
अपरिभाषित
परे है जो,
वेदना-सवेदना
प्रेषण-संप्रेषण
प्रणय-परिणय
प्राप्य-अप्राप्य परिधि से
सांस हो तुम,
जो शारीर को
शव से भिन्न करती है
पल पल साथ
फिर भी विस्मृत,
लेकिन जब घुटन होती है तो,
तो...... तुम्हे
खीच कर फेफडे में
भरने को मन करता है

शुक्रवार, 1 मई 2009

उपेक्षा


उपेक्षा
जागी उकताई रात ने
पैदा किया एक और
आवारा सूरज

भौर से शाम तक
झुलसता भटकता रहा
कोण बदल बदल कर
देखता रहा
धरा को शायद
छांव मिल जाय
प्यार मिल जाय
पनाह मिल जाय
छांव प्यार पनाह तो दूर
किसी ने एक दृष्टि
ना दी आभार में..........

हर कोई
उपभोग करता रहा
रोशनी का
पर किसी ना देखा
सूरज की और

उपेक्षा की आग
सीने में लिये
जलता रहा दिन भर
थोथे स्वार्थी सम्बन्धो पर
जब घीन्न आने लगी

डूब मरा
समन्दर में जाकर कही........
और रात .......
पुन: गर्भवती हो गईे

*

vinay k joshi

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

क्षणिकाएं


क्षणिकाएं

(1)
सहमी सी
डरी सी
हारी सी
निकली थी घर से
नुक्कड़ पर
कई विकल्प खड़े थे,
सच्चाई और साहस
चुन लिए और
जीत गई
*
(२)
हम
ग़म के घरोंदे बन
एकाकी बैठे थे
तुमने छुआ
खुशियों की तितलियाँ
बिखर गई |
*
(३)
अपनों से
बिछडने की रेखा
ह्रदय पर गहरी पड़ी है
पर नवजात के

अधरों की थिरकन
हर बार,
दीवारों पर टंगी
तस्वीरों पर
भारी पड़ी है
*
(४)
श्वेत - श्याम
सपने थे मेरे
फिर एक निशा
तुम आये - मेरे सपने में
और सभी रंगीन हो गए
*
(५)
उल्लासित बेटी
स्वेच्छा प्रणय पर,
-पर माँ की पलकों पर
नमी आ गई.
पूछा जो किसी ने ... क्यूँ ?
तो सिसकी ले बोली
मुझे अपनी माँ
याद आ गई .
*
(६)
फिर
एक बार
शाकाहारी होने की
कसमें खाई
और भेड़ों के
निर्णायक वोटों से
भेड़िये जीत गए
*

विनय के जोशी

बुधवार, 25 मार्च 2009

पलकों पर ठहरी है रात की खुशबू


पलकों पर ठहरी है
रात की खुशबू
अनकही अधूरी हर
बात की खुशबू

साँसों की थिरकन पर
चूड़ी का तरन्नुम
माटी के जिस्म में
बरसात की खुशबू

पतझड़ पलट गया
दहलीज तक आकर
जीत गई अंकुरित
ज़ज्बात की खुशबू

अहसास ऐ मुहब्बत
परत परत मर गया
जिंदा रही पहली
मुलाकात की खुशबू

पलकें झुका के कैफियत
कबूल की मगर
ज़वाबों से आती रही
सवालात की खुशबू

जुल्फों की कैद में
कुछ अरसा ही रहे
उम्र भर आती रही
हवालात की खुशबू

कली रो पड़ी हूर के
गजरे में संवर कर
भूल ना पाई पडौसी
पात की खुशबू

लापता वियाकरण
अश'आर से मगर
हर लफ्ज से है
"विशेष" बात की खुशबू

गुरुवार, 12 मार्च 2009

गुरुवे नमः


कहाँ से आते चन्दा मामा
कैसे उगते रात सितारे
फल पेडों पर कैसे लगते
पेड़ खड़े है बिना सहारे
पश्चिम सारा लाल हो गया
काली अंधियारी रात फैली
छोटा सा मन बुझ ना पाता
सब कुछ लगता एक पहेली
विद्यालय में आते जैसे
जादू सारा समझ में आता
सहज सरल उदाहरण देकर
शिक्षक सारे भेद बताता
जो सूरज आकाश ना उगता
क्या हालत नजरों की होती
दृष्टी देते मात-पिता और
गुरु देते आँखों को ज्योति

रविवार, 8 मार्च 2009

विहग विचार


दसियों कबूतर
एक दूसरे को
ठेलते
रेत में
ना जाने क्या
चुगते रहते !
मै उदास,
आंगन में
दाने बिखेर
कबु आओ....कबु आओ
करता घंटों मनुहार
पर नही आते
कपोत आगार

जीवन सहरा में
बचपन किसी
नख़लिस्तान सा
छूट गया
पर नही बदली
नियति
तर्जनी के
प्रथम पोर पर
अंगुष्ठ दबाये
वाम करतल पर ठुड्डी
क्षितिज पर दृग
उर में बैचेनी
कोहनी तले कागज़
प्रतिक्षारत
तृण कातर
आमंत्रण लाचार
कबहु आओ....कबहु आओ
पर नही उतरते
मन आंगन में
विहग विचार

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

माँ कभी बीमार नही होती


*
क्या पता
सोती भी है या नही ,
जब मैं सोता ,
वह जगी होती ,
जब मैं जगता , वह
झाडू - पानी -सफाई कर ,
फूंकनी ले ,
चुल्हे के पडौस में
बैठी होती ,
कभी घट्टी पर ,
कभी गौशाला में ,
गुदडियों को सुई चुभोती ,
ढिबरी में तेल भर
उजाला करती ,
दिन भर
कुछ ना कुछ करती ही रहती ,
मुझे बुखार आता ,
दद्दू खटियां पर पडे रहते ,
बाबा खांसते- खांसते दुहरा जाते....
पर , पर माँ कभी बीमार नही होती
फ़िर भी.........
फिर भी ना जाने
जल्दी .....
मर क्यूं जाती है ?

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

बोनसाई


क्या पेड भी
कभी करते है अपराध..... ?
अगर नहीं तो
क्यूँ बना दिये जाते है बोनसाई....?
ना पिपिलिका थपकियां
ना कोयल की लौरियां
ना पतझड का वस्त्रदान
ना बंसंत का धूपस्नान
ना छाह ना राह
ना टोही ना बटोही
ना प्रेमासिक्त पुकार
ना वृषभ हुँकार
ना गर्द ना गर्दी
ना गर्मी ना सर्दी
ना श्रमिक ना कलेवा
ना गडरिये ना सिंदूरदेवा
ना तमगे सा आईना
दाढी बनवाता गंवई ना
ना शिखर गरूड चिंतन
ना धरा संत मंथन
प्रकृति कभी
गलत ना रचती
जो कुछ है वह सही है
स्वर्ग का तो पता नहीं
कद्दावरों का
नर्क है तो बोनसाई है।
लुभाते भाते सबको
पर किस्मत
सलौनी नहीं होती
कद छोटा होता है
पर महसूसियत
बोनी नहीं होती

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

पंखुडी गुलाब की।


फूल संग माथे चढी
पंखुडी गुलाब की।
बिछडी तो कदमों पडी
पंखुडी गुलाब की।
*
जोड लिये फागुन में
ओर नये नाते
गुलाल रंग रंग गई
पंखुडी गुलाब की।
*
चांदनी सी रंगत ओ
सीप सी है पलके
अधरों पर धर दिन्ही
पंखुडी गुलाब की।
*
याद तेरी जा पिघली
पलकों के किनारे
ओंस भीगी बिरहन हुई
पंखुडी गुलाब की।
*
अधर धरी बांसुरिया
मालकौस गाये
जल रही किताबों में
पंखुडी गुलाब की।
*
धनुष देह श्वेत केश
झुर्रियां कपोल पर
समय हाथी रौंद गया
पंखुडी गुलाब की।
*
लकडी डाली हाथ जोडे
यार सभी चल दिये
देह संग भस्म हुई
पंखुडी गुलाब की।
*
विनय के जोशी

प्रेषक : vinay k joshi | समय : 6:37 PM
इन्हें भी पढ़ें19 टिप्पणी:
अवनीश एस तिवारी said...
धनुष देह श्वेत केश
झुर्रियां कपोल पर
समय हाथी रौंद गया
पंखुडी गुलाब की।

यही नहीं समझा |
और सब बहुत बहुत अच्छे लगे |
बधाई |

-- अवनीश तिवारी

February 12, 2009 6:57 PM
vinay k joshi said...
अविनाशजी ,
बुढापे का चित्रण है | कमर झुककर देह को धनुष जैसा बना देती है | बाल सफेद हो जाते है मुख पर झुर्रिया पड़ जाती है क्योकि समय रूपी हाथी गुलाब सी देह को रौंद जाता है | कविता पसंद कर उत्साहवर्धन हेतु आभार |
सादर,
विनय के जोशी

February 12, 2009 8:13 PM
संगीता पुरी said...
बहुत सुंदर....

February 12, 2009 8:31 PM
manu said...
विनय जी,
पहले तो मन को मोहा और आख़िर में उदास कर गई पंखुडी गुलाब की,,,,,,,,,,,
बहुत प्यारे शब्दों में बाँधा है.....इस खूबसूरती के साथ.....

February 12, 2009 9:40 PM
sangeeta said...
विनय जी ,
बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति है. आपने इस रचना में जीवन को अंत तक पहुंचाया लेकिन मुझे कहीं बचपन नही नज़र आया. यदि वो भी शामिल होता तो ये जीवन चक्र पूरा हो जाता. .
सुंदर भाव और शब्दों का चयन है..
बधाई

February 12, 2009 10:53 PM
rachana said...
पतंग ,कन्चे, गोटी,गुडिया
समय की धार ने छीन लिया
सावन संग बह चली
पंखुडी गुलाब की
rachana

February 13, 2009 2:57 AM
rachana said...
आप की कविता के क्या कहने मन आनंदित हो गया
सादर
रचना

February 13, 2009 2:59 AM
Harihar said...
याद तेरी जा पिघली
पलकों के किनारे
ओंस भीगी बिरहन हुई
पंखुडी गुलाब की।
क्या बात है विनय जी! बहुत खूब

February 13, 2009 3:34 AM
Arun Mittal "Adbhut" said...
विनय जी,

ये तो रंग बिरंगी कविता है मन प्रसन्न हो गया ......................

February 13, 2009 7:40 AM
neelam said...
लकडी डाली हाथ जोडे
यार सभी चल दिये
देह संग भस्म हुई
पंखुडी गुलाब की।

लकडी डाली हाथ जोडे
यार सभी चल दिये
देह संग भस्म हुई
पंखुडी गुलाब की।

विनय जी आपकी रचना पुरस्कृत करने योग्य है ,ये मेरा मत है |

February 13, 2009 11:41 AM
आलोक सिंह "साहिल" said...
हर बार कि तरह .......बेहतरीन.
आलोक सिंह "साहिल"

February 13, 2009 12:19 PM
M.A.Sharma "सेहर" said...
सुंदर अभिव्यक्ति

अन्तिम कुछ पंक्तियाँ तो गूढ़ अर्थों के साथ
अद्भुत रही विनय जी !!

सादर !!

February 13, 2009 1:02 PM
praveen Parashar said...
badiya bahut hi accha hai ....

February 13, 2009 1:08 PM
तपन शर्मा said...
गुलाब की पंखुड़ी को जीवन के हर पड़ाव से आपने बखूबी जोड़ा है..
सहेज कर रखने वाली कविता है ये...
धन्यवाद

February 14, 2009 12:12 AM
परमजीत बाली said...
बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

धनुष देह श्वेत केश
झुर्रियां कपोल पर
समय हाथी रौंद गया
पंखुडी गुलाब की।

February 14, 2009 12:54 AM
shyamskha shyam said...
धनुष देह श्वेत केश
झुर्रियां कपोल पर
समय हाथी रौंद गया
पंखुडी गुलाब की।
सुन्दर अभिव्यक्ति पर बधाई
श्याम सखा श्याम

February 14, 2009 11:47 AM
Anonymous said...
shaandaar

meethimirchi.blogspot.com

February 15, 2009 1:08 AM
संदीप तिवारी said...
maza aa gaya bhai saab... aapne kamal kar diya...dil ko chho gayi pankhudi gulab ki..

February 15, 2009 1:14 AM
Dixant Tiwari (soni) said...
dil ko choo gai

pankhudi gulaab ki

February 15, 2009 1:16 AM

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

कविता कब होती है

अरुण मयूख की
पहली छुअन से
खिले किसलय तो
कविता होती है
*
घन गरजे
मयूरा नाचे
मयूरी चूगे आंसू तो
कविता होती है |
*
क्या है तकली,
पूनी, सूत, कूकड़ी,
स्नातक पूछे तो
कविता होती है |
*
चाँद की रोटी
रात तवे पर
जल जाए तो
कविता होती है
*
दो प्यासे, सहरा में
तू पी, तू पी कर,
मर जाए तो
कविता होती है |
*
शहीद की माँ ,
जख्मी की माँ के,
पोछे आंसू तो
कविता होती है |
*
छंद मुक्त या
छंद युक्त, मन
पिरोये मोती तो
कविता होती है |
*
विनय के जोशी

रविवार, 1 फ़रवरी 2009

बसंत आमन्त्रण


कानन कुण्डल घूंघर बाल
ताम्ब कपोल मदनी चाल
मन बसंत तन ज्वाला
नजर डगर डोरे लाल ।

पनघट पथ ठाडे पिया
अरण्य नाद धडके जिया
तन तृण तरंगित हुआ
करतल मुख ओढ लिया ।

आनन सुर्ख मन हरा
उर में आनंद भरा
पलकों के पग कांपे
घूंघट पट रजत झरा ।

चितवन ने चोरी करी
चक्षु ने चुगली करी
पग अंगुठा मोड लिया
अधरों पर उंगली धरी ।

कंत कांता चिबुक छुई
पूछी जो बात नई
जिव्हा तो मूक भई
देह न्यौता बोल गई ।

मंगलवार, 27 जनवरी 2009

अश्रु सिंचन

भूकंप
जो पिछले दिनों
आया था शहर में
कुछ ज्यादा ही
जोर से था
मैं तो जलजले की
अभ्यस्त थी पर
मकान में दरारे आ गई
कुछ दिनों बाद
एक कारीगर बुलाया
और मरम्मत करवा दी
जाते-जाते उसने कहा .....
दरारों मे भरी सीमेंट की
तराई करना |
पानी की धार को
सीमेंट ने
एकदम सोंख लिया
मुझे अपने
शहीद बेटे का
पहला दूध पीना
याद आ गया |
फिर तराई के लिए
पानी की जरुरत न रही |

हर दुखी का दुखडा मैं था

दर्पण में दिखता
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता |
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से |
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से |
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से |
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ |
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ |
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को |
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था |
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था |
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था |
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया |
मुझ से
परे निकल
"मैं" पा गया |

सोमवार, 26 जनवरी 2009

मेरा कद


एक सुबह उठा
तो मेरा कद खो गया
मैं हतप्रभ
अब कैसे काम चलेगा
मैं बौना या सामने वाला
कैसे पता लगेगा
अपने कद की तुलना में
औरों के कद
आंक रखे थे
स्वार्थ के पैमाने पर
सबको नाप रखे थे
कौन मेरे पीछे और
किसके पीछे मैं
पूँछ हिलाऊँगा
इसका बोध खो गया
हे भगवान
एक ही रात में
क्या से क्या हो गया
कद का यह भ्रमजाल
मेरा उसका आपका नहीं सबका है
पेश है एक शब्दचित्र
जिसमें नाम फकत मेरा है
शहर से दूर था वह कॉलेज
जिसमें मैं पढ़ता था
कुछ पैदल कुछ
साइकिलों पर आते
मैं पैदल..........
हसरत से देखता साइकिल को
परीक्षा के दिन
एक सेठ पुत्र ने
साइकिल पर बिठा दिया
परीक्षा से महत्वपूर्ण
साइकिल की सवारी होगई
जीवन में पहली बार लगा
मेरा भी कुछ कद है
फिर नौकरी की साइकिल खरीदी
अच्छा लगा
स्कूटर बगल से गुजरता तो
मायूस हो जाता
कद कुछ कम हो जाता
बुढापे मे मोपेड खरीदी
तीस की गति पर
हवाई जहाज का आनंद लिया
पैदल और साइकिल सवारों को देख
नाक-भौं सिकोड़ता
चलने का शउर नहीं
बार-बार ब्रेक लगाना पड़ता है
कद बढ़ने का भ्रम जारी रहा
फिर एक दिन पौत्री ने कहा
दादाजी मम्मी को बैंक से लोन मिला है
घर में कार लायेंगे और
आपको भी खूब घुमायेंगे
पुत्र की भक्ति
पुत्रवधू की श्रद्धा
या दादाजी पर दया
कुछ भी हो
कार की कल्पना ने
कुल मिलाकर मेरा कद
कुछ और बढ़ा ही दिया
और अब चतुर्थ आश्रम
चला चली की तैयारी
कन्धों की सवारी की प्रतिक्षा
लोग कह रहे हैं
पांव विमान से बाहर है
इन्हें ढँकों.......
मेरा कद ......?

शनिवार, 17 जनवरी 2009

एकाकी

चला गया मुझको ठुकरा कर
कौन रहा सदा अपना
भौर भये जैसे कोई
टूट गया मीठा सपना
-
खोटा सौदा बनी जिन्दगी
बिखर गए सच्चे आने
उखड़ी सांसे थाम खड़ी है
जिंदा मौत सिरहाने
-
तन के तीरथ कब के उजडे
मांस विहीन अस्थि पत्थर
उजड़ी आँखे साए तकती
फटी बिवाई पग थर थर
-
खून के रिश्ते कब के रिस गए
टूट गए कच्चे धागे
एकाकी जीवन का बीहड़
पसरा है इसके आगे

साँस्कृतिक दमन

दो फूल उगे,
मुस्कराये,
आंखें खोली,
मां के आंचल में
अमृत चखा,
घुटने चले
थोडी दूर,
और गली के
गुलमोहर हो गये ।
फ़िर हुआ आक्रमण
ध्वनी तरंगो का
ठिठके और भाग लिये
घर के भीतर,
टकटकी लगाये
देखने लगे
रोशन आयत ।
यकायक
हाथों में उग आये
गिल्ली डंडे की जगह
बन्दुक और चाकू,
अमृत कलश
जहरीले कौतुक बन गये
खत्म हो गया
जड और चेतन में फ़र्क ।
लहुलुहान पर्दे पर
उभर आया
आप देख रहे है
फ़लाना नेटवर्क ।


भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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