मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

नजर अव नीर नहीं रखती

मुहब्बत अब
हीर नही रखती
गजल अब
मीर नही रखती
जठर की आग से
भाप बन उड गया
नज़र अब
नीर नहीं रखती
दौलते फ़रेब
साथ हो तो आना
राजनीति अब
फ़कीर नही रखती
भीष्म सोये है
बारुद के ढेर पर
सियासत अब
तीर नही रखती
हरण क्या करेगा
दुर्योधन बेबस
द्रोपदी अब
चीर नही रखती
सभी कुटिया में
आमंत्रित है सादर
सीता अब
लकीर नही रखती
लिफ्ट पर आसक्त
भूली सीढी दर सीढी
नई उमर अब
धीर नहीं रखती
नि:शब्द कत्ल होती
चौराहे पर
इंसानियत अब
पीर नही रखती

सोमवार, 8 दिसंबर 2008


चिकनी त्वचा बदन कसीला
चाम स्पर्श पर शोर मचावे
एक अटारी ठाडे रह कर
सारे जग को नाच नचावे
का सखी अबला ?
ना सखी तबला ।

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

अब न धड़कता दिल मेरा

अब न
मचलता दिल मेरा
अब न
धड़कता दिल मेरा
एक निशा
झोली में डाले
भोर से पहले
विदा हुए
क्षितिज पथ,
अनहद प्रतीक्षा
नयन सावन एक हुए
साँस आखरी,
वंदे मातरम
उल्लासित मन
क्षत विक्षित तन
रक्त श्वेद श्रृंगार धरे
धूल धरा तुम एक हुए
आज गर्व से मस्तक ऊँचा
पर नही शेष कुछ जीने में
जिस पत्थर से
चूड़ी तोडी
उसे रख लिया सीने में
अब न
धड़कता दिल मेरा
अब न
मचलता दिल
.
विनय के जोशी

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

तन्हाई की दर्द से शादी है

छले गये जो उजालों की घात में
अंधेरों से लिपट कर रोयेगें रात में

रोशनी मेहमां थी अंधेरों की रात भर
सुबह सूरज ले के आयी सौ्गात में

भीगें सहरा को धूप मरहम सी लगी
फ़फ़ौले हो गये थे बरसात में

फ़ंसी मछली हंसा परिन्दा
भरोसा और आदमी की जात में

नदी समा गई समन्दर में
कनारे उलझे रहे औकात में

तन्हाई की दर्द से शादी है
सितारों तुम भी आना बारात में

विनय

बुधवार, 12 नवंबर 2008

पुनर्जन्म

दो झोले लेकर चला था
मैं सफर को
एक में पाप बटोरने थे
एक में पुण्य
राह में एक तरफ पाप
दूसरी तरफ पुण्य
बिखरे पड़े थे
पाप की राह में छांव थी
शीतल जल ..... लुभावना संगीत
खुशबुएँ ........... रसीले स्वाद
सुर......सुरा....सुंदरियाँ ...
क्या नही था
सब कुछ लुभावना
अपना सा था
पराया कुछ भी नही था
दूसरी तरफ कुछ नही था सहज
धूप में तपते पत्थर
नि:शब्द रुदन ...
रहस्यमयी सिसकियाँ .....
हर तरफ़ मदद को पुकारते हाथ उग रहे थे
हर तर्जनी की पौर पर ठहरा था एक आंसू
जो फकत मेरी रूह की छुअन चाहता था
मगर छूना तो दूर
मैं उस तरफ़ देख भी ना सका
किसी एक आंख वाले ऊंट की तरह
एक तरफ चरता चला गया
और पापों से अपनी झोली भरता चला गया
धीरे धीरे बोझ से मेरा जिस्म
एक ओर झुकता चला गया
और फ़िर एक दिन
अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ
पाप के लहराते समंदर में जा गिरा
तभी
कुछ हाथ आगे बढे
मेरे डूबते सर पर
सफेद टोपी पहना दी
.........और................
मेरे सभी पाप
पुण्य में बदल गए
,
विनय के जोशी

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

कुछ दोहे

मोर पपिहा खेजडी, करता रहा तलाश ।
धीरे धीरे मिट गया, बादल एक आकाश।।
.
टपटप टपके टापरा, पिया गये परडेर ।
बरखा से काली पडी, नजर कूप मुण्डेर।।
.
पूरनमासी शरद की, अमी पयस बरसात ।
अंक यामिनी गुलमुहर, झुलसा सारी रात।।
.
असली सूरत लापता, मुह खोटे अनगीन।
जैसा ओसर सामने, मुखडे पर धर लीन।।
.
हेम रजत झंकार नित, गूंजे जाके कान।
गाली सी वाको लगे, आरती अरु अजान।।
.
अंधियारा मावस भरा, रोशन बिन्दु प्रहार।
अभिकर्ता जुगनू हुए , चंदा करे व्यापार।
,
विनय के जोशी

रविवार, 12 अक्टूबर 2008

क्षणिकाएं

(१)
जल
छू सकता
महसूस कर सकता
छाया को
लेकिन, अपने साथ
बहा नही सकता
(२)
छाया
लिपट सकती
चूम सकती
जल से
लेकिन, उसमें
नहा नही सकती
(३)
पेड़
अचल तन मन
मनस्वी
नदी छाया के
खेल से अविचलित
तपस्वी
(४)
नदी
पहाड़ से बिछडती
विलाप करती
कितनी शांत जब
सागर से
मिलाप करती
(५)
पहाड़
उर की आग
मन का गुबार
घुटन का उभार
(६)
बादल
रुई के
उड़ते फोहे नम
पहाड़ के
जख्मों पर
लगाते मरहम
(७)
फूल
अम्बर को
स्वीकार
माटी का
आभार
.
विनय के जोशी

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008

रंग

लाल हरे
नीले पीले
एक दूजे से मिल
फिर-फिर,
नये-नये
रंग बनाते रंग,
रंग बिरंगे रंग
बिखेर दिए तुमने
हर टहनी पर
हवा संग लहराती टहनियाँ ,
आसमान में रंग भरती टहनियाँ
गगन में अगन और
बदन में बरखा के अभी
कुछ ही रंग भरे थे कि
तुम चल दिए लाम पर
कलेवा और कसमें
दी थी राह के लिए,
तुम तो रंग भी समेट ले गए
लेकर गए हजारों,
लौटे केवल तीन लेकर
नयन नीर का तर्पण देकर
इन्द्रचाप से मुख मोड़ लिया
तस्वीर तुम्हारी सजा केसरिया
दर्पण से नाता तोड़ लिया
बीज सहेजा था जो उर में
हरा उससे जोड़ लिया
सौगात तुम्हारी सर माथे
रंग सफेद ख़ुद ओढ़ लिया
.
विनय के जोशी

सोमवार, 6 अक्टूबर 2008

घुटन

थम जाते है
कदम मेरे लिए
चेतना का हर पल
मुझे समर्पित है
हर आह
हर सिसकी पर
रहता है मेरा नाम
लेकिन हर एक को
अपने से अलग
करने की कोशिश में पाता हूँ
मै
जिस्म में चुभा कांटा हूँ
चीखो
चिल्लाओ
कोहराम मचा दो
पर मुझे तो ना कोसो
अरे !
तुम्हे तो फकत
मेरी चुभन का ही दर्द है
मेरा तो
दम घुटा जा रहा है
तुम्हारे जिस्म में
.
विनय क जोशी

रविवार, 5 अक्टूबर 2008

दोहा

सच राघव का रूप है, सच गोपाला गाँव
जाके हिरदे सच बसा, तीरथ वांके पाँव

बुधवार, 1 अक्टूबर 2008

शहर के पेड़

अट्टालिकाओं
निर्मित कुआँ
खासंते वाहन
उगलते धुआं
सुलगती चिमनियाँ
जहरीले आगार
जबरन तन नौचते
विद्युत भुजंग तार
ज्ञापन विज्ञापन
छाती में कीले
दिल खुरचे
नाम छीले
छिकती खिड़कियाँ
बेसुध वातायन
उतावले राहगीर
घृणित सिंचन
फ़िर भी
जिन्दा है
सब कुछ सहते
सभ्यों की
असभ्यता
उर में धरते
क्यूँ कि,
पेड़ आत्महत्या
नही करते
.
विनय के जोशी

शनिवार, 27 सितंबर 2008

मिनी के होस्टल जाने पर

मैं
रो नहीं रहा
यह तो कुछ अन्यायी
पलों की किरचें है
जो पलकों के किनारे
चुभ गई है
बस उन्हे निकालने को
आँखों से पानी
बह चला हैं
तुम्हारा भाई मुक्त उन्मुक्त
पर तुम्हे खिड़की से झांकना भी मना
तुम्हारे कपडों का
जाँच और बहस के बाद
तय किया जाना
मैं बाजार से आता
तुम सहमी पढ़ती होती
भाई कम्प्यूटर पर
मोबाईल
दोस्त
अंतरजाल
तुम्हें वार्जित ,
वर्जित तुम्हारा ऊँचा बोलना
तेज आवाज मे गाना
आरोपों का उत्तर देना
ओह !
फ़िर सब कुछ धुंधला हो गया
मैं रो थोड़े ही रहा हूँ
मुझे रोने की
फुर्सत भी नही है
रोना मेरे लिए विलासिता है
अभी तो हर पल
मेरे अहसास को
तुम्हारे साथ रखना है
जो तुम्हे बेटी होने की
याद दिलाता रहे
मैं रो नही रहा
यह तो कुछ
अन्यायी पलों की किरचे है
जो पलकों के किनारे खरोंच जाती है
रंगहीन लहु नजरों के साहिल से
छलक जाता है
मैं रो नही रहा ........
रोऊंगा तो तब
जब तुम
ससुराल चली जाओगी
क्योंकिं
तब मैं तुम्हारी चौकसी
किसी और को सौंप
बेरोजगार हो जाऊंगा
.
विनय के जोशी

गुरुवार, 25 सितंबर 2008

मैं

दर्पण में दिखता
तन मेरा,
महसूस करता
मन मेरा,
पर "मैं" कहाँ .... ?
प्रतिपल प्रश्नों से
उलझता,
मेरा पता,
पर "मैं" लापता
नयन निर्झर
जिव्हा हर-हर
कर्मठ हस्त
उदर मस्त
ठाकर मस्तक
चाकर पग तक
नृत्य रत
नख-शिख
चेतना,
पर "मैं" कहाँ .....?
अन्वेषित कट गया
बाह्य जगत से,
तंद्रा टूटी
एक हल्की थपक से
गिर पड़ा था
एक नन्हा,
राह रपट से
धूल-धूसरित गेसु
और ढलका
अश्रु गाल से
तभी बिजली सी कौंधी !
वह .. वह ..
आंसू मैं हूँ
शाला जाते किसलय का
रक्त रंजित
जानू मैं हूँ
अहा ! पा लिया
मैंने "मैं" को
अब हर तरफ़
मैं ही मैं था
हर दुखी का
दुखड़ा मैं था
सूनी कलाई
चूड़ियों का
टुकड़ा मैं था
विस्तरित "मैं"
व्योम व्यापक
छा गया
मुझ से
परे "मैं" पा गया

रविवार, 21 सितंबर 2008

यादें

किरणों के
पांखी तो
दिन
माह
बरस को
यादों में बदल
उड़ जाते है,
रह जाते है हम
सुनसान द्वीप में
धधकते ज्वालामुखी की तरह
बूंद बूंद झुलसते सपने
राख राख उछलते लम्हे
जलते
पिघलते
उबलते
तह दर तह
जमा होते अहसास
पर्वत के अश्रु
पत्थर होने से लेकर
सूरज के कदमों तले
रौंदे जाने तक
संज्ञाशून्य बने रहना है
या........
दर्द का ज्वालामुखी
सीने में दफ़न किए
एक दिन ख़ुद ही
दफ़न हो जाना है |
.
विनय के जोशी

मंगलवार, 16 सितंबर 2008

मुक्तक

सच्ची
फ़तह वही
जो खुशी दे
हासिल से
चूक तक
सच्चा
कवित्त वही
जिसे पढ
हिल जाये
वाचाल से
मूक तक

> विनय के जोशी

रविवार, 14 सितंबर 2008

प्रेत

मैं प्रेत को नही जानता
मैं प्रेत को मानता भी नही
परवश होना मेरे लिए
कल्पना की बात है
नियंत्रण की डोर ख़ुद
अपने ही हाथ है
लेकिन यह मान महल
अब कोई कुरेद रहा है
कोई कठफोड़वा प्रेत
विश्वास दरख्त छेद रहा है
जटिल से सहज विकास पथ है
शाश्वत यात्रा विकास रथ है
बात उलझाकर सुलझाना
मेरी फितरत है
पेशे से अध्यापक हूँ
पढाना मेरी किस्मत है
बात अधिक ना उलझाकर
सहज शब्दों में बताता हूँ
कई वर्ष पहले मेरी कक्षा में
दो छात्र थे, यूँ तो कई थे पर
दो विशेष याद है
एक मेधावी दूसरा फिसड्डी
एक शर्ट पेंट पहनता
दूसरा बनियान चड्डी
पहले को पढाने में, मैं करता
अपनी सम्पूर्ण उर्जा समर्पित
दूसरा रहा सदा उपेक्षित
मैं कहता पढ़ना
नही काम तेरा
चपरासी सा काम
करता वो मेरा
पहला दिनों दिन प्रखर होता चला गया
दूसरा आख़िर पढ़ाई छोड़ चला गया
पर ना छोड़ी विनम्रता
सदा करता मेरा सम्मान
जहाँ भी मिलता झुकता
कहता गुरूजी प्रणाम
नियति की माया अनोखी
धूप हँसे और शबनम रोती
बरसों में जो माला पिरोती
एक पल में बिखरे मोती
अब बात को अंजाम तक लाता हूँ
अपनी जिन्दा मौत की दास्ताँ सुनाता हूँ
पहले शिष्य ने परदेश को
देश कबूला हैं
मेरा क्या अपने गाँव का
नाम तक भूला है
एक बार आया
मैं मिलने गया
हाथ में सिगरेट
मुंह फेर लिया
मैं फ़िर फ़िर
जाता रहा उसके पास
मन में लिए यह आस
मुझे पहचाने स्वीकारे
बचपन की शिक्षा का
एहसान माने
वह बेशर्म हर बार
नजरे चुराता रहा
मेरे दिल पर बार बार
हथौडा सा लगा
दूसरा गावं से स्टेशन तक
रिक्शा चलता है
मुझे पैदल चलते देख
आदर से बिठाता है
हर बरस मेरे घर
नारियल रौली पुष्प ले आता है
श्रद्धा से नमन करता
आचमन कराने को
चरण धुलता है
आज फ़िर शिक्षक दिवस है
और वह मेरे घर आया है
रौली का वह टीका देगा
श्रीफल भेंट करेगा वो
कांधे पर माला लादेगा
चरणों में शीश धरेगा वो
मैं पिघलता अन्दर से
घबराता इस मंजर से
चाहता हूँ नमन करना
चाहता उसे गले लगाना, पर
जकड लेता मुझे कोई
पकड़ लेता मुझे कोई
पराधीन मेरी काया है
क्या करूँ ...... ?
एक पुराने अध्यापक के
प्रेत का मुझ पर साया है
.
विनय के जोशी

मंगलवार, 9 सितंबर 2008

एक और दिन उगा

एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
लो फिर शुरु हुआ
झुठ कहने और
सुनने का सिलसिला
मन एकाकी औरा ओढे
जन अरण्य मे
भटकने का सिलसिला
विवेक ह्र्दय सत्य सोया
बस स्वार्थ है जगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा

शनिवार, 6 सितंबर 2008

भूकंप

भूकंप
जो पिछले दिनों
आया था शहर में
कुछ ज्यादा ही
जोर से था
मैं तो जलजले की
अभ्यस्त थी पर
मकान में दरारे आ गई
कुछ दिनों बाद
एक कारीगर बुलाया
और मरम्मत करवा दी
जाते-जाते उसने कहा .....
दरारों मे भरी सीमेंट की
तराई करना |
पानी की धार को
सीमेंट ने
एकदम सोंख लिया
मुझे अपने
शहीद बेटे का
पहला दूध पीना
याद आ गया |
फिर तराई के लिए
पानी की जरुरत न रही |

.vinay k joshi

बुधवार, 27 अगस्त 2008

उस पार

मार्ग अंधेरा हो गया, अभी तो है मंझधार
नैय्‍या फसी तूफान में, खेवय्‍या उस पार

रोज निहारे रूप को, इतराये हर बार
बिन श्रृंगार सीरत रही, कदरदान उस पार

मन का विहग कब का उड़ा तन तन्‍हा लाचार
तैरना ना जानू मैं सखी, सजन खडे उस पार

हाथ बढा हक छीन ले, सच्‍चाई हथियार
क्‍यूं लाचारी ऒढ तू, आस तके उस पार

भक्‍ति शक्‍ति शतगुनी, बिन पूंजी व्‍यापार
जितनी चाहे निपज लो, खरीददार उस पार

तिनके तिनके जमा किये, ले न सके आकार
नव सृजन फिर शुरू करे, आऒ चले उस पार

मंगलवार, 26 अगस्त 2008

कामचोर

हृदय कुछ
कमजोर हो गया है ।
पूरी क्षमता से
काम नही करता,
शायद कामचोर हो गया है ।
किडनी भी
ठीक नही रहती,
डॉक्‍टर की निग़ाह पर है ।
औरत मर्द एक से दिखते,
बच्‍चे बन्‍दर गढ लेती है ।
थक सी गई है आँखे,
कुछ का कुछ पढ लेती है ।
इतने कामचोरों संग रह कर,
आत्‍मावलोकन कर लेता हूँ ।
पछतावे से हर पल बोझल,
अपनी नज़रे भर लेता हूँ ।
मुझे याद आते वह पल,
जब हम केंटीन में सोते थे ।
घंटों खिड़की पर लाईन लगा कर,
लोग किस्‍मत को रोते थे ।
काम करता मेरे हिस्‍से का,
लम्‍हा-लम्‍हा छीजता था ।
जाने कौन स्‍वेद कणों से
मेरी तनख़ा सींचता था ।

रविवार, 24 अगस्त 2008

सरल बात

सतत प्रयासरत रहते जो
मनुज सदा सराहे जाते
छोटे छोटे कदमो से ही
पर्वत पार कर वो जाते
बूंद बूंद से बादल बन
सम्पूर्ण धरा पर छा जाते
छोटे छोटे लक्ष्यों से ही
लक्ष्य बड़ा सहज पा जाते
.
मुस्कराहट विजय आहट
लघुता से विस्तार पाते
जितना झुके उतना उठे
आदर दे आदर है पाते
कमी खोजते अपने भीतर
बाहर भूरी प्रशंसा पाते
अच्छाई अनुगूँज अनोखी
दिग् दिगन्त द्विगुणित पाते

शनिवार, 23 अगस्त 2008

एक और दिन उगा

एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा
एक और दिन उगा
लो फिर शुरु हुआ
झुठ कहने और
सुनने का सिलसिला
मन एकाकी औरा ओढे
जन अरण्य मे
भटकने का सिलसिला
विवेक, ह्र्दय, सत्य सोया
बस स्वार्थ है जगा
एक और दिन उगा
काल के कबुतर ने
जीवन के जन्गल से
एक और दाना चुगा

मंगलवार, 19 अगस्त 2008

हिम-नद

बरसों के
गिले शिकवे
आँसुओं में
पिघल गये ।
झगड़ने को
लपके थे
नज़रे मिली
और लिपट गये ।

शुक्रवार, 15 अगस्त 2008

आगे बढ़ता देश हमारा

एक जर्जरित फ्रॉक में
दूसरा उघाड़े बदन
चमड़ी पर मेल की पपड़ियाँ
कूल्हे पर फटी निक्कर
गटर की अविरल धारा
कभी बोतल मिल जाती
कभी मिल जाता
पेप्सी का खाली टिन
दौड़ कर किनारे
बोरी के खजाने में
जमा कर आते
खुश हो जाते
दुगुने उत्साह से
फिर लग जाते
नज़र पड़ी
बहते आधे खाए सेव पर
हाथ से पोंछा
कुछ ख़ुद खाया
कुछ उसे दिया
खाली पेट में कुछ गया
तभी हाथ में पकड़ी
लकड़ी से अटक गया
रंग-बिरंगा एक कपड़ा
डंडा बन गया झंडा
करते कीचड़ में धमाल
अबोध भाई-बहन
संवेद स्वर में गाते रहे
झंडा ऊँचा रहे हमारा
आगे बढ़ता देश हमारा

सोमवार, 11 अगस्त 2008

अजाना गाँव

पलक झपकी

बीत गये

जाने कितने बसन्त

व्यतित होंगे

और कितने

आ जायेगा अन्त

मील के पत्थर

त्वरित आते

गुजर जाते

वर्तमान की झोली

खाली ही पाते

केश मन को

स्याह कर

जाने कब

धवल हो गये

शीशे की दीवारों में

कैद चक्षु कमल

हो गये

चिकने गाल मैदान

नालियों में

ढल गये

स्वार्थ रंजित

मीठे बोल

गालियों में

बदल गये

लाचारी अधर धर

दंत पंक्ति खो गई

तीर सी सधी काया

ढीला धनुष हो गई

मोह का सहरा

रेणु धंसते

पांव है

ना जाने अब दूर कितना

अबुझ अजाना

गांव है

रविवार, 10 अगस्त 2008

तरक्की

हुबहू जिस्म जैसी
मशीन बनाना
जटिल और खर्चीला था
इसलिए जिस्म को ही
मशीन बनाना
तय किया गया
पहले चरण में
नंगेपन से
पाबन्दी हटाई गई
अवाम हक्का-बक्का
शहर बदहवास
निगाहें निगरा की
हवाइयां उड़ी हुई
एक युवक
बाज़ार में दिगम्बर दौड़ा
फ़िर एक तन्वी भी
दफ़न था जो जहन में
हरकत में आने लगा
शर्मीले खुलकर बतियाने लगें
खवातीन गहने की तरह
नंगापन सजाने लगीं
बुजुर्ग ज़माने को
कोसते-खासते
मजा लेने लगें
इसतरह नंगापन
जिस्म पर ही नहीं
रूह में भी पसरता चला गया
अब नंगापन
आम बात है
और जमाना मुकम्मल
तरक्की की राह पर है |

गुरुवार, 7 अगस्त 2008

कांटा

थम जाते हैं कदम
मेरे लिए
चेतना का हर पल
मुझे समर्पित है
हर आह
हर सिसकी
पर रहता है
मेरा नाम
लेकिन
चाहता है हर कोई
मुझे अपने से
अलग करना
नहीं कोई मैं हस्ती
कद में भी नाटा हूं
मैं जिस्म में
चुभा कांटा हूं
चीखों चिल्लाओं
कोहराम मचा दो
पर मुझे तो ना कोसो
अरे तुम्हें तो दर्द है
फकत मेरी चुभन का
मेरा तो
दम घुटा जा रहा है
तुम्हारे जिस्म में

समय चक्र


समय चक्र
भविष्य को रौंद
भूत बना देता है
रह जाते हैं
अस्थियों पर
रेडियम लगाये
यादों के पिंजर
जो राह नहीं दिखाते
याद दिलाते हैं
किन वजहों से
तुम राह भूले

बुधवार, 6 अगस्त 2008

बिजली : क्षणिकाएँ

:-
(१)
शतप्रतिशत
विद्युतीकरण
की प्राप्ति में
छोटी सी कमी
सरकार को
खली न थी
तार था
खम्भा था
बल्ब था
बिजली न थी
(२)
महाभारत
की कथा में
अचानक
सभी भक्तों की
खुशियाँ चली गई
चीर हरण के
दृश्य से पहले
बिजली चली गई
(३)
बिजली के जलते
बल्ब को देखो
कही खुशियाँ
एक स्विच की
मोहताज तो नही ?
(४)
केवल बिजली ही
काफी नही
रोशनी के लिए
अभय भी चाहिए
गुलेल और कंकर से
(५)
एकाकार
राजनीति और बाहुबली
मानों
करंट और बिजली-

मंगलवार, 5 अगस्त 2008

मंहगाई

कोटिल्य भूले
वस्तु विनिमय छोडा
विश्व बैंक का अंकुश डाला
छतरी तोडी
चद्दर फाडा
भ्रष्टाचारी छत्र संभाला
भेडिया राजा
भेड़ रियाया
भीड़ भ्रामरी अकेले ताला
दिन दल्ले
रात पतुरिया
जिस्म जख्म अस्तित्व छाला
बकरी भगाई
चरखा तोडा
वैश्वीकरण का हाथी पाला
किया उत्सर्जन
तब चिल्लाये
हाय महंगाई मार डाला

शनिवार, 2 अगस्त 2008

साथी

आग लगी थी
दिल में
आँसू चला
बुझाने को
अधरों तक
आया तो
सिसकी ने कहा
मैं भी साथ चलती हूँ

मंगलवार, 29 जुलाई 2008

अश्रु सिंचन

भूकंप
जो पिछले दिनों
आया था शहर में
कुछ ज्यादा ही
जोर से था
मैं तो जलजले की
अभ्यस्त थी पर,
मकान में दरारे आ गई
कुछ दिनों बाद
एक कारीगर बुलाया
और मरम्मत करवा दी
जाते-जाते उसने कहा .....
दरारों मे भरी सीमेंट की
तराई करना |
पानी की धार को
सीमेंट ने
एकदम सोंख लिया
मुझे अपने
शहीद बेटे का
पहला दूध पीना
याद आ गया |
फिर तराई के लिए
पानी की जरुरत न रही |

सोमवार, 28 जुलाई 2008

जीवन

भीख में मिला
एक वस्त्र
जिसमे
धोखों के धागों से
टीसों के टांके लगे हैं
जख्मों से भरी जेब और
तन्हाईयों के तमगे लगे है
फ़िर भी
अनमोल है यह
समझ मेरी
कीमत न इसकी
आंक पाती है
क्यूंकि कभी कभी
नजर उनकी
सुई सी चुभती हुई
सुख का एक
बटन टांक जाती है |

अजन्मी

जर्जर काया
पराश्रित जीवन
बुढापा भरी
उस पर नारी .....
मैं कौन ?
मेरी ख्वाहिशे क्या ?
अधेड़ प्रौढ़|
कुल की माया
नाती-पोतों की आया
उपेक्षा के बदले
वारी वारी ........
लहलहाती फसल
खनकता कुन्दन
श्रंगारित दासी
जर जमीन जोरू
जागीरदारी ........
आदमखोर स्वछंद
मासूम कैद
संभल कर चलो
ओ नारी !
अभी हो कुंवारी ....
दूध भैया का .....
खिलौने भैया के ......
स्कूल भैया जाएगा ..........
उफ !
बहुत बुरा है,
दो पैरों का जानवर
अपनी मादा के साथ |
शुक्र है मैं मुक्त हूँ
उन्मुक्त हूँ
जीवन रहा नही
मरण वार दिया
तन तारिणी
वन्ही सागर
पल में पार किया ...
सांसें लेती
लाशों ने मुझे
कोख ही मे मार दिया

शनिवार, 26 जुलाई 2008

माँ

जब धूप पसर जाती
रसोईघर के बाहर
मैं वहां बैठ
अ से अम्मा
लिखा करता
माँ धुएँ के कोहरे में
गुनगुनाती
आटा गूंथती
रोटियां बेलती
और साथ ही बनाती
आटे की छोटी-छोटी गोलियां
फिर उन्हें
आँगन में फैला देती
एक-दो-तीन
कई चिडियां आती
चहचहाती
गोलियां चुगती
सजीव हो जाते
बेलन, कलछी, चिमटा
अग्नि नृत्य करती
चूल्हे की मुंडेर पर
रसोईघर जलसाघर हो जाता
.
अब न घर में माँ हैं
न शहर में चिडियां
बस केवल
आटे की गोलियां बची है
जब कभी तन्हा होता हूँ
कुछ गोलियां बिखेर देता हूँ
और माँ
चिडियां बन
मन के आँगन में
उतर आती है

पितृ क्रम

धीर गंभीर
गृहस्थ फकीर
सटीक मितभाषी
पद्कमल काशी
कसरती काया
बरगदी छाया
तार्किक दार्शनिक
आस्तिक वैज्ञानिक
एक उम्र गुजारी
पिता जैसा
बनने की कोशिश मे |
फ़िर एक दिन
एहसास हुआ
मैं तो
अपने पिता सा
ना बन पाया
मेरा बेटा
मुझ सा बन गया|
हम जो नही है
वह ही सच है
हम जो है
वह भ्रम है |
हर बेटा अपनी उम्र के
पचासवे बरस में
यह कविता लिखता है
यही जीवन क्रम है |

विस्तार संकुचन दैनिक भास्कर रसरंग २९/०६/२००८ को प्रकशित

दैनिक भास्कर रसरंग २९/०६/२००८ को प्रकशित

विस्तार संकुचन

.

कभी गोलू कभी गोटली

कभी पोलू कभी पोटली

कभी बिट्टू कभी किट्टू

कभी पठ्ठा कभी पप्पू

कह कर उसे बुलाता

और वह हर बार

हां पापा !

कह कर दौडा आता

और अब

कभी फादर कभी पापा

कभी ओल्डी कभी डैडी

कभी बाऊसा कभी बापू

कभी काकू कभी दादू

कह कर मुझे बुलाता

और मैं हर बार

हां बेटा !

कह कर दौडा आता

गुरुवार, 24 जुलाई 2008

हे कृष्णा.........


हे कृष्णा........
ये कैसी मृगतृष्णा

दस रचनायें
रखी सामने
एक नई तैयार
मौलिकता अब
बाजार में बिकती
सृजन बना व्यापार
हे कृष्णा.....
ये कैसी मृगतृष्णा

तारीफों के
टोकरे बटोरे
ख़रीदे पुरस्कार
झट गर्दन
घुसा लेते
जहाँ भी देखे हार
हे कृष्णा ....
ये कैसी मृगतृष्णा

लखपति
करोड़ चाहता
करोड़पति अनंत
मुद्रा पिपासु
सतत चलता
इसका आदि ना अंत
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

बड़ी बहन
असुंदर कह कर
छोटी को अपना ली
अब बड़ी
विशिष्ट लगाती
साधारण घरवाली
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

मची भगदड़
पंडितों मध्य
श्राध्दोत्सव के काज
यकृत हृदय
फेफड़े किडनी
उदर बन गए आज
हे कृष्णा ....
ये कैसी मृगतृष्णा

चंगों से नफरत
और दर्दी से
करते प्रेम
स्तेथोस्कोप को
कार्ड समझते
पेशेंट ए टी एम
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा

जन्म से ही
दौड़ शुरू और
मृत्यु अन्तिम धाम
मन सीपी का
मोती उपेक्षित
प्यारा लगता चाम
हे कृष्णा ...
ये कैसी मृगतृष्णा
बहुत ढील दे दी तू ने
अब तो कुछ कसना
हे कृष्णा ...

राह थकन
पग छाले भूला
ले दर्शन की आस
उचक-उचक कर
नख-शिख देखूँ
फिर भी ना बुझती प्यास
हे कृष्णा ....
जीवन ज्योत
भले ही बुझ जाय
बनी रहे यह तृष्णा
हे कृष्णा .....

शनिवार, 19 जुलाई 2008

हिन्द-युग्म: हर दुखी का दुखड़ा मैं था

हिन्द-युग्म: हर दुखी का दुखड़ा मैं था
महिला श्रमिक

धड़ाधड़ उतर रही थी
कार से साड़िया रंग-बिरंगी
चश्मे-मोबाइल हाय-हेलो
हलचल मची थी

दो घड़ी छाया मिलती थी
आज वो भी नहीं है
क्या करे भाग्य पर
किसका वश है
बरामदे में मीटिंग है
आज महिला दिवस है

बोली वो दांतों से
घूँघट संभाले
चलो बहना आज
धूप में ही खालें

-विनय के॰ जोशी

बुधवार, 16 जुलाई 2008

बिजली पर कुछ क्षणिकाएँ :-
(१)
शतप्रतिशत
विद्युतीकरण
की प्राप्ति में
छोटी सी कमी
सरकार को
खली न थी
तार था
खम्भा था
बल्ब था
बिजली न थी
(२)
महाभारत
की कथा में
अचानक
सभी भक्तों की
खुशियाँ चली गई
चीर हरण के
दृश्य से पहले
बिजली चली गई
(३)
बिजली के जलते
बल्ब को देखो
कही खुशियाँ
एक स्विच की
मोहताज तो नही ?
(४)
केवल बिजली ही
काफी नही
रोशनी के लिए
अभय भी चाहिए
गुलेल और कंकर से
(५)
एकाकार
राजनीति और बाहुबली
मानों
करंट और बिजली-
.
विनय के जोशी

हिन्द-युग्म: अभी उठो! एक पेड़ लगा लो

हिन्द-युग्म: अभी उठो! एक पेड़ लगा लो


भावनाओं की झील
तैरते शब्द सुमन

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